शुक्रवार, अक्तूबर 09, 2020

सनातन का स्थल जनकपुर...


        भारतीय धर्म ग्ंथों में मिथिला की भूमि पवित्र  है। सातवें मनु  वैवश्वत मनु के इछ्वाकु वंश का न्टग राजा को ब्राह्मण को न्याय नहीं मिलने पर गिरगीट होन् का शाप देने के कारण राजा न्टग ने अपने पुत्र वसु को राजसिंहासन पर बैठाने के बाद राजा न्टग शाप को भोगने लगा था । श्रीमद्भागवत नवम स्कंध , विष्णु पुंराण , महाभारत अनुशासन पर्व के अनुसार  वैवश्वत मनु के पुत्र ईछ्वाकु के सौ पुत्रों में विकुछि ,निमि तथा दंड प्रमुख थे । इछ्वाकु के बरहवें पुत्र नीमी द्वारा वैजयंत नगर की स्थापना कर अपने पिता के ह्रदय को अह्लाद प्रदान करने के लिए हिमालय की तराइ में वसिष्ठ को वरण किया परंतु य्गय को गौतम से कराने के के बाद महर्ष वसिष्ठ ने राजा नीमी को  अचेतन शरीर के कारण विदेह हो गये थे । महर्षि  भ्टगु द्वारा राजा नीमी को शाप मुक्त कर  वायु रूप में  प्रजा म्ं वास  रखा तथा महर्षियों ने नीमी के शरीर कोपकड कऋ मथना प्रारंभ करने पर मिथि की उत्पति हुअा था । मिथि को विदेह ,जनक, तथा मथिल के नाम से ख्याति मिला है ।वाल्मीकीयरामायण  सप्तदश : सर्ग के अनुसार  माता सीता का उलेख वेदवती के रूप में किया गया है । सतयुग में देव गुरू व्टहस्पति के पौत्री ब्रह्मर्षि कुशध्वज की पुत्री वेदवती भगवान विष्णु का आत्मीय वरण की थी ।  हिमालय के वन में वेदवती भगवान विष्णु को वरण के लिए तपस्या कर रही थी , उसी समय वेदवती को देख कर रावण कामजनित हो गया था । वेदवती रावण को तिरस्कार करने के कारण रावण द्वारा महर्षि कुशध्वज  की हत्या कर दी । वेदवती अपने पिता कुशध्वज चिता  के साथ अग्नि मे प्रविष्ठ हो गयी । वेदवती दूसरे जन्म में कमल के समान वलिका  के रूप जन्म ली ।इस वलिका को  रावण अपने राजमहल में लाकर पुत्री के रूप में पालन पोषण करने लगा था । मंत्री ने  बालिका को देख कर भयभीत होने के बाद रावण द्वारा  बालिका को समुद्र में फेक दिया गया था । तत्पश्चात वालिका भूमि को प्रप्त होकर सीतामढी जिले के मिथिला का राजा जनक के यग्यमंडप के मध्यवर्ती भूभाग में जा पहुंची । त्रेता युग में राजा जनक द्वारा हल के मुखभाग से भूभाग के जोते जाने पर साध्वी कन्या प्रकट हुई तथा सती साध्वी कन्या को राजा जनक ने अपने जनकपुर के राजमहल मे पुत्री बना कर रखा और कन्या का नाम करण सीता हुई थी । वेदवती राजा जनक की पुत्री सीता के रूप में प्रकट हुई और भगवान राम की पत्नि हुई है। प्राचीन काल में मिथिला की राजधानी जनकपुर का प्रसिद्ध राजा जनक थे।  सीता माता के पिता जनक थे। जनकपुर शहर  माता सीता तथा भगवान राम  के रूप में विख्यात है।सीता संहिता ग्रंथ में जन्म स्थल कर्म स्थल समाहित स्थल तीर्थस्थल स्वयंबर स्थल सीता कुंड अहिल्या स्थान जनकपुर संप्रति नेपाल के जनकपुर अंचल और धनुषा जिला में स्थित है।यहाँ की प्रमुख भाषा मैथिली, हिन्दी और नेपाली है। प्राचीन काल में यह विदेह राज्य की राजधानी थी। विदेह राज्य के संस्थापक निमि के वंश में महाराज सीरध्वज जनक 22 वें जनक थे, और अयोध्यापति राजा दशरथ के समकालीन थे। दाशरथि राम की अर्द्धांगिनी सीता मिथिलेश जनक सिरध्वज की पुत्री थी। महाकवि विद्यापति के ग्रंथ "भू-परिक्रमा में लिखा है कि जनकपुर से सात कोस दक्षिण महाराज जनक का राजमहल था।यथा : जनकपुरादक्षिणान्शे सप्तकोश-व्यतिक्रमें। महाग्रामे गहश्च जनकस्य वै। जनक वंश का कराल जनक के समय में नैतिक अद्य:पतन हो गया। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में लिखा है कि कराल जनक ने कामान्ध होकर ब्राह्मण कन्या का अभिगमन किया। इसी कारण वह वनधु-बंधवों के साथ मारा गया। अश्वघोष ने भी अपने ग्रंथ बुद्ध चरित्र में इसकी पुष्टि की है। कराल जनक के पश्चात जनक वंश में जो लोग बच गए, वे निकटवारती तराई के जंगलों में जा छुपे। जहां वे लोग छिपे थे, वह स्थान जनक के वंशजों के रहने के कारण जनकपुर कहलाने लगा।जनकपुर में स्वयंबर के दौरान भगवान राम के द्वारा शिव धनुष तोड़ने का स्थल धनुषा है।रामायण  अनुसार जनक राजाओं में सबसे प्रसिद्ध सीरध्वज जनक हुए। यह बहुत ही विद्वान एवं धार्मिक विचारों वाले थे। शिव के प्रति इनकी अगाध श्रद्धा थी। इनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने इन्हें अपना धनुष प्रदान किया था। यह धनुष अत्यंत भारी था। जनक की पुत्री सीता धर्मपरायण थी वह नियमित रूप से पूजा स्थल की साफ-सफाई स्वयं करती थी। एक दिन की बात है जनक जी जब पूजा करने आए तो उन्होंने देखा कि शिव का धनुष एक हाथ में लिये हुए सीता पूजा स्थल की सफाई कर रही हैं। इस दृश्य को देखकर जनक जी आश्चर्य चकित रह गये कि इस अत्यंत भारी धनुष को एक सुकुमारी ने कैसे उठा लिया। इसी समय जनक जी ने तय कर लिया कि सीता का पति वही होगा जो शिव के द्वारा दिये गये इस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने में सफल होगा।
अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार राजा जनक ने धनुष-यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ से संपूर्ण संसार के राजा, महाराजा, राजकुमार तथा वीर पुरुषों को आमंत्रित किया गया। समारोह में अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र रामचंद्र और लक्ष्मण अपने गुरु विश्वामित्र के साथ उपस्थित थे। जब धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने की बारी आई तो वहाँ उपस्थित किसी भी व्यक्ति से प्रत्यंचा तो दूर धनुष हिला तक नहीं। इस स्थिति को देख राजा जनक को अपने-आप पर बड़ा क्षोभ हुआ। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है- "अब अनि कोउ माखै भट मानी, वीर विहीन मही मैं जानी तजहु आस निज-निज गृह जाहू, लिखा न विधि वैदेही बिबाहू सुकृतु जाई जौ पुन पहिहरऊजो तनतेऊँ बिनु भट भुविभाई, तौ पनु करि होतेऊँ न हँसाई" राजा जनक के इस वचन को सुनकर लक्ष्मण के आग्रह और गुरु की आज्ञा पर रामचंद्र ने ज्यों ही धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई त्यों ही धनुष तीन टुकड़ों में विभक्त हो गया। बाद में अयोध्या से बारात आकर रामचंद्र और जनक नंदिनी जानकी का विवाह माघ शीर्ष शुक्ल पंचमी को जनकपुरी में संपन्न हुआ। कहते हैं कि कालांतर में त्रेता युगकालीन जनकपुर का लोप हो गया। करीब साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व महात्मा सूरकिशोर दास ने जानकी के जन्मस्थल का पता लगाया और मूर्ति स्थापना कर पूजा प्रारंभ की। तत्पश्चात आधुनिक जनकपुर विकसित हुआ। जानकी मंदिर जनकपुर - नौलखा मंदिर: जनकपुर में राम-जानकी के कई मंदिर हैं। इनमें सबसे भव्य मंदिर का निर्माण भारत के टीकमगढ़ की महारानी वृषभानु कुमारी बुंदेला ने करवाया। पुत्र प्राप्ति की कामना से महारानी वृषभानु कुमारी बुंदेला ने अयोध्या में 'कनक भवन मंदिर' का निर्माण करवाया परंतु पुत्र प्राप्त न होने पर गुरु की आज्ञा से पुत्र प्राप्ति के लिए जनकपुरी में १८९६ ई. में जानकी मंदिर का निर्माण करवाया। मंदिर निर्माण प्रारंभ के १ वर्ष के अंदर ही वृषभानु कुमारी को पुत्र प्राप्त हुआ। जानकी मंदिर के निर्माण हेतु नौ लाख रुपए का संकल्प किया गया था। फलस्वरूप उसे 'नौलखा मंदिर' भी कहते हैं। परंतु इसके निर्माण में १८ लाख रुपया खर्च हुआ। जानकी मंदिर के निर्माण काल में ही वृषभानु कुमारी के निधनोपरांत उनकी बहन नरेंद्र कुमारी ने मंदिर का निर्माण कार्य पूरा करवाया। बाद में वृषभानुकुमारी के पति ने नरेंद्र कुमारी से विवाह कर लिया। जानकी मंदिर का निर्माण १२ वर्षों में हुआ लेकिन इसमें मूर्ति स्थापना १८१४ में ही कर दी गई और पूजा प्रारंभ हो गई। जानकी मंदिर को दान में बहुत-सी भूमि दी गई है जो इसकी आमदनी का प्रमुख स्रोत है। जानकी मंदिर परिसर के भीतर प्रमुख मंदिर के पीछे जानकी मंदिर उत्तर की ओर 'अखंड कीर्तन भवन' है जिसमें १९६१ ई. से लगातार सीताराम नाम का कीर्तन हो रहा है। जानकी मंदिर के बाहरी परिसर में लक्ष्णण मंदिर है जिसका निर्माण जानकी मंदिर के निर्माण से पहले बताया जाता है। परिसर के भीतर ही राम जानकी विवा
 मंडप है। मंडप के खंभों और दूसरी जगहों को मिलाकर कुल १०८ प्रतिमाएँ हैं।
विवाह मंडप (धनुषा) : इस मंडप में विवाह पंचमी के दिन पूरी रीति-रिवाज से राम-जानकी का विवाह किया जाता है। जनकपुरी से १४ किलोमीटर 'उत्तर धनुषा' नामक स्थान है। बताया जाता है कि रामचंद्र जी ने इसी जगह पर धनुष तोड़ा था। पत्थर के टुकड़े को अवशेष कहा जाता है। पूरे वर्षभर ख़ासकर 'विवाह पंचमी' के अवसर पर तीर्थयात्रियों का तांता लगा रहता है। नेपाल के मूल निवासियों के साथ ही अपने देश के बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, राजस्थान तथा महाराष्ट्र राज्य के अनगिनत श्रद्धालु नज़र आते हैं। जनकपुर में कई अन्य मंदिर और तालाब हैं। प्रत्येक तालाब के साथ अलग-अलग कहानियाँ हैं। 'विहार कुंड' नाम के तालाब के पास ३०-४० मंदिर हैं। यहाँ एक संस्कृत विद्यालय तथा विश्वविद्यालय भी है। विद्यालय में छात्रों को रहने तथा भोजन की निःशुल्क व्यवस्था है। यह विद्यालय 'ज्ञानकूप' के नाम से जाना जाता है।मंडप के चारों ओर चार छोटे-छोटे ‘कोहबर’ हैं जिनमें सीता-राम, माण्डवी-भरत, उर्मिला-लक्ष्मण एवं श्रुतिकीर्ति-शत्रुघ्र की मूर्तियां हैं। राम-मंदिर के विषय में जनश्रुति है कि अनेक दिनों तक सुरकिशोरदासजी ने जब एक गाय को वहां दूध बहाते देखा तो खुदाई करायी जिसमें श्रीराम की मूर्ति मिली। वहां एक कुटिया बनाकर उसका प्रभार एक संन्यासी को सौंपा, इसलिए अद्यपर्यन्त उनके राम मंदिर के महन्त संन्यासी ही होते हैं जबकि वहां के अन्य मंदिरों के वैरागी हैं।इसके अतिरिक्त जनकपुर में अनेक कुंड हैं यथा- रत्ना सागर, अनुराग सरोवर, सीताकुंड इत्यादि। उनमें सर्वप्रमुख है प्रथम अर्थात् रत्नासागर जो जानकी मंदिर से करीब 9 किलोमीटर दूर ‘धनुखा’ में स्थित है। वहीं श्रीराम ने धनुष-भंग किया था। कहा जाता है कि वहां प्रत्येक पच्चीस-तीस वर्षों पर धनुष की एक विशाल आकृति बनती है जो आठ-दस दिनों तक दिखाई देती है। मंदिर से कुछ दूर ‘दूधमती’ नदी के बारे में कहा जाता है कि जुती हुई भूमि के कुंड से उत्पन्न शिशु सीता को दूध पिलाने के उद्देश्य से कामधेनु ने जो धारा बहायी, उसने उक्त नदी का रूप धारण कर लिया।
नेपाल की राजधानी काठमांडू से 400 किलोमीटर दक्षिण पूरब में बसा है। जनकपुर से करीब १४ किलोमीटर उत्तर के बाद पहाड़ शुरू हो जाता है। नेपाल की रेल सेवा का एकमात्र केंद्र जनकपुर है। यहाँ नेपाल का राष्ट्रीय हवाई अड्डा भी है। जनकपुर जाने के लिए बिहार राज्य से तीन रास्ते हैं। रेल मार्ग जयनगर से है, सीतामढ़ी जिले के भिठ्ठामोड़ से बस द्वारा है, त मधुबनी जिले के उमगाँउ से बस द्वारा है। बिहार के दरभंगा, मधुबनी एवं सीतामढ़ी जिला से जनकपुर स्थान पर सड़क मार्ग से पहुंचना आसान है। बिहार की राजधानी पटना से इसका सीतामढ़ी होते हुये सीधा सड़क संपर्क है। पटना से इसकी दूरी 140 की मी है।यहाँ से काठमांडू जाने के लिए हवाई जहाज़ भी उपलब्ध हैं। यात्रियों के ठहरने हेतु यहाँ होटल एवं धर्मशालाओं का उचित प्रबंध है। यहाँ के रीति-रिवाज बिहार राज्य के मिथलांचल हैं। प्राचीन मिथिला की राजधानी जनकपुर थी । नेपाल के जनकपुर के केन्द्र में स्थित एक हिन्दू मन्दिर एवं ऐतिहासिक है । सीता कुंड हिन्दू धर्म का तीर्थ-सीतामर्हि, बिहार, मे स्थापित है जहा सीता माता का जन्म हुई थी ।भारतीय साहित्यिक स्रोतों में अत्यन्त प्राचीन काल तक के मिथिला के शासकों के नाम प्राप्त होते हैं। इनमें से विदेह (जनक) वंशीय राजाओं के लिए तो वाल्मीकीय रामायण एवं पुराणों में वर्णित है  । वाल्मीकीय रामायण में जनक की वंश परम्परा दी गयी है। रामायण में सीरध्वज जनक स्वयं ही अपने पूर्वज राजाओं के नाम दशरथ को बताते हैं। वाल्मीकीय रामायण के अनुसार मिथिला पर रामायण काल तक निम्नलिखित राजाओं ने शासन किया- निमि के पुत्र मिथि द्वारा मिथिला के संस्थापक राजा थे। मिथि के पुत्र जनक द्वारा जनकपुर नगर की स्थापना कर मिथिला की राजधानी रखी गयी थी । जनक वंश में उदावसु ,नन्दिवर्धन , सुकेतु ,देवरात ,बृहद्रथ ,महावीर , सुधृति ,धृष्टकेतु हर्यश्व , मरु , प्रतीन्धक , कीर्तिरथ , देवमीढ ,विबुध , महीध्रक , कीर्तिरात , महारोमा , स्वर्णरोमा , ह्रस्वरोमा तथा सीरध्वज जनक  है । मिथिला का राजा सीरध्वज जनक की पुत्री माता सीता की विवाह अयोध्या का राजा दशरथ के पुत्र भगवान राम के साथ अगहन शुक्ल पंचमी त्रेता युग में हुआ । मिथिला का राजा  सीरध्वज  जनक के पुत्र भानुमान्  दवारा मैथिल वंश प्रारंभ किया । मिथिला देश पर मैथिल वंश के राजाओ में भानुमान् , .शतद्युम्न ,शुचि ,.ऊर्जनामा , .शतध्वज , .कृति , .अंजन , कुरुजित् ,अरिष्टनेमि , श्रुतायु , सुपार्श्व , सृंजय ,क्षेमावी , अनेना , भौमरथ , सत्यरथ ,उपगु, उपगुप्त, स्वागत ,.स्वानन्द, सुवर्चा,सुपार्श्व ,सुभाष , .सुश्रुत ,.जय ,.विजय धृति , बहुलाश्व ,कृति है।इस अन्तिम राजा कृति के साथ ही जनकवंश की समाप्ति मानी गयी है। इन्हें 'कराल जनक'  कहा गया है। मिथिला के तेरहवें राजा क्षेमावी ( क्षेमारि' )  तथा महाभारतकालीन राजा क्षेमधूर्ति है। विदेह राजाओं के पतन के पश्चात् मिथिला में केन्द्रवर्ती शासन का अभाव रहा; यद्यपि अवशिष्ट विदेह राजाओं के नाम  हैं। 750 ई.पू. के लगभग वैशाली गणतंत्र की स्थापना के बाद मिथिला भी वज्जिमहासंघ के सम्मिलित शासन में आ गयी। 525 ई.पू. के आसपास मगध-सम्राट् अजातशत्रु द्वारा वज्जिमहासंघ के विनाश के बाद पुनः मिथिला में किसी तरह सम्भवतः गणतंत्रीय शासन चलते रहा। 326 ई.पू. के आसपास महाक्षत्रांतक कहलानेवाले महापद्मनन्द ने अजातशत्रु के आक्रमण से बचे हुए मिथिला के गणतंत्र को भी समाप्त कर दिया।हालाँकि इस समय में शासन-प्रणाली गणतंत्रात्मक ही थी या पुनः राजतन्त्र का उदय हो गया था ।  नानपुर परगना के दरभंगा से ज्ञात भूभाग में अलर्क नामक एक राजा हुए थे और उनके बाद बलि नामधारी एक अन्य राजा ने राज्य किया था। ये राजा बलि विदेह राजाओं के केन्द्रीय शासन के अन्त से लेकर मौर्यकाल तक था । पौराणिक तथा जातक साहित्य में उल्लेख नहीं होने तथा उसके बाद गणतंत्रीय शासन स्थापित हो जाने से तो यही लगता है कि पुनः महापद्मनन्द द्वारा पूर्णतः गणतंत्र के अन्त के बाद ही, अर्थात् मौर्यकाल में या कुछ और बाद में ये राजा बलि हुए होंगे। वर्तमान दरभंगा प्रमण्डल के मधुबनी जिले में प्रसिद्ध बलिराजगढ़ इसी राजा बलि का राजधानी-स्थल था। मगध-साम्राज्य की प्रबलता से लेकर पाल,गुर्जर तथा चन्देल आदि तक भारत की विभिन्न राजनीतिक शक्तियों के अधीन मिथिला भी रही और यहाँ केन्द्रीय शासन तथा स्वतंत्रता का प्रायः अभाव ही रहा। विदेह राजतंत्र तथा बज्जी महासंघ के विघटन के समय से लेकर कर्नाट वंश के प्रतिष्ठाकाल से पहले तक मिथिला का इतिहास निरन्तर पराजय तथा दासता का इतिहास रहा। कर्नाट वंश, जिसे सिमराँव राजवंश के नाम से भी जाना जाता है, की स्थापना के रूप में उस नवयुग का सूत्रपात हुआ जो राज्य-निर्माण, महान् उपलब्धि तथा गौरव-गाथा का युग साबित हुआ। नान्यदेव (पूर्व राजधानी - नान्यपुर। बाद में 'सिमराँवगढ़' में राजधानी। 'सिमराँव' में निर्मित किला पर अंकित तिथि 18 जुलाई 1097 ई. सिद्ध होती है।.मल्लदेव द्वारा राजधानी - 'भीठ भगवानपुर' मे बनायी थी । .गंगदेव - 1147 ई. से 1187 ई. तक। इन्होंने वर्तमान मधुबनी जिले के अंधराठाढ़ी में विशाल गढ़ बनवाया था।.नरसिंह देव - 1187 ई. से 1225 ई. तक। रामसिंह देव - 1225 ई. से 1276 ई. तक। .शक्ति (शक्र देव )  सिंह देव - 1276 ई. से 1296 ई. तक। इनके बाद युवराज के अवयस्क होने से उनके नाम पर 1303 ई. तक मंत्रिपरिषद का शासन रहा।.हरिसिंह देव - 1303 ई. से 1324 ई. तक। मुगल आक्रमण से नेपाल पलायन कर गये थे । कर्णाट राजाओं के काल में साहित्य, कला और संस्कृति का विकास बड़े पैमाने पर हुआ था। दरभंगा, मधुबनी आदि पूर्व मध्यकालीन तीरभुक्ति (तिरहुत) के विभिन्न स्थलों से बहुत अधिक मात्रा में सूर्य,विष्णु, गणेश,उमा-महेश्वर आदि पाषाण प्रतिमाओं की प्राप्ति हुई है।इन मूर्तियों की प्राप्ति में कर्णाटकालीन शासकों का महत्वपूर्ण योगदान है। पूर्वमध्यकालीन पाल कला से इतर आंशिक परिवर्तन और स्थानीय स्तर पर होनेवाले शैलीगत परिवर्तन को अंधराठाढ़ी, भीठभगवानपुर आदि विभिन्न स्थानों पर प्राप्त कर्णाटकालीन प्रतिमाओं में देखा जा सकता है जिसके मूर्तिअभिलेख स्पष्ट करते हैं कि इनकी भाषा पाल कालीन भाषाओं से अलग है। हाल के वर्षों में इन क्षेत्रों की प्रतिमाओं का अध्ययन होने लगा है। ओइनवार वंश (सुगौना वंश)  - 1353 ई. से 1526 ई. तक कर्णाटवंशी अंतिम मिथिलेश हरिसिंह देव के नेपाल पलायन के बाद करीब 30 वर्ष तक मिथिला के राजनीतिक मंच पर अराजकता तथा नृशंसता का ताण्डव होते रहा। सुल्तान फिरोजशाह तुगलक के प्रथम बंगाल आक्रमण के समय मैथिल ब्राह्मण ओइनवार वंश  के कामेश्वर ठाकुर को मिथिला का शासनाधिकार दे दिया गया।.कामेश्वर ठाकुर - 1354 ई. में  राजधानी 'ओइनी' ( 'बैनी') गाँव। .भोगीश्वर  ठाकुर - 1354 ई. से 1360 ई. तक।.ज्ञानेश्वर (गणेश्वर) ठाकुर - 1360 मिथिला का शासक रहे है । ोॉ.कीर्तिसिंह देव - 1402 ई. से 1410 ई. में मिथिला राज्य विभाजित हुआ था ।.भवसिंह देव (भवेश) - 1410 ई. में अविभाजित मिथिला के प्रथम ओइनवार शासक हुए। भव सिंह द्वारा अपने नामपर भवग्राम  मधुबनी जिले मे भव नगर , भवग्राम या भवनाथपुर बसाया था। भव सिंह देव के शासन काल में मिथिला के विदूषक गोनू झा तथा महान् दार्शनिक गंगेश उपाध्याय थे। भव.देव सिंह - 1410-1413  में भवदेव सिंह द्वारा ओइनी तथा भवग्राम को  दरभंगा जिले का वाग्मती किनारे 'देवकुली' (देकुली) गाँव बसाकर  मिथिला की राजधानी स्थापित किया। .राजा शिवसिंह देव  द्वारा मिथिला की राजधानी 'देकुली' से हटाकर दरभंगा जिले का  'गजरथपुर'/गजाधरपुर/शिवसिंहपुर में स्थापित किया गया था । दरभंगा के वाग्मती किनारे किला बनवाया था। जिसे किलाघाट कहते हैं। 1416 ई .  में जौनपुर के सुलतान इब्राहिम शाह की सेना गयास बेग के नेतृत्व में मिथिला पर टूट पड़ी थी। दूरदर्शी महाराज शिवसिंह ने अपने मित्रवत् कविवर विद्यापति के संरक्षण में अपने परिवार को नेपाल-तराई में स्थित राजबनौली के राजा पुरादित्य 'गिरिनारायण' के पास भेज दिया। स्वयं भीषण संग्राम में कूद पड़े। मिथिला की धरती खून से लाल हो गयी। शिवसिंह का कुछ पता नहीं चल पाया।राजा शिवसिंह की प्रतीक्षा में 12 वर्ष तक लखिमा देवी येन-केन प्रकारेण शासन सँभालती रही।.लखिमा रानी - 1416-17 से 1428-29 तक कविवर विद्यापति के सहयोग से शासन-प्राप्ति एवं संचालन की है।
पद्म सिंह - 1429-1430  , रानी विश्वास देवी - 1430-1442. (राजधानी- विसौली) , हरसिंह देव( शिवसिंह तथा पद्म सिंह के चाचा) - 1443 से 1444 तक। , नरसिंह देव - 1444 से 1460/62 तक। धीर सिंह - 1460/62 से। इनके बाद इनके भाई भैरव सिंह राजा हुए। भैरव सिंह - उपशासन धीर सिंह के समय से ही। मुख्य शासन संभवतः 1480 के लगभग से। (उपनाम - रूपनारायण। बाद में 'हरिनारायण' विरुद धारण किया।) इन्होंने अपनी राजधानी वर्तमान मधुबनी जिले के बछौर परगने के 'बरुआर' गाँव में स्थापित किया था।वहाँ अभी भी मिथिला में अति प्रसिद्ध 'रजोखर' तालाब है, जिसके बारे में मिथिला में लोकोक्ति प्रसिद्ध है :- "पोखरि रजोखरि और सब पोखरा। राजा शिवसिंह और सब छोकरा।।"इसके साथ ही कुछ-कुछ दूरी पर दो और तालाब है। साथ ही संभवतः उसी युग का विष्णु-मन्दिर है, जो लक्ष्मीनारायण-मन्दिर के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें भारतीय मध्यकालीन शैली की विष्णु-मूर्ति है।इन्हीं महाराज (भैरव सिंह) के दरबार में सुप्रसिद्ध महामनीषी अभिनव वाचस्पति मिश्र तथा अनेक अन्य विद्वान् भी रहते थे।.रामभद्रसिंह देव - 1488/90 से 1510 तक। इन्होंने अपनी राजधानी पुनः अपने पूर्वज शिवसिंह देव की राजधानी से करीब 2 मील पूरब में अपने नाम पर बसाये गये 'रामभद्र पुर' में स्थानान्तरित किया। अब इसके पास रेलवे स्टेशन है।.लक्ष्मीनाथसिंह देव - 1510 से 1525 तक। इनका उपनाम कंसनारायण था। ये अपने पूर्वजों के विपरीत दुर्गुणी थे। इनके साथ ही इस राजवंश के शासन का भी अंत हो गया।
शिवसिंह देव के बाद से ही मिथिला का शासन-तंत्र शिथिल होने लगा था और अराजकता का आगमन होने लगा था। आपसी कलह के कारण भी राजधानी एक छोर से दूसरे छोर तक जाती रहती थी। दूसरी जगह भी साथ-साथ उपशासन रहता था (इसलिए भी कई राजाओं का समय भिन्न-भिन्न जगहों पर भिन्न-भिन्न मिलता है)। इस वंश के शासन के बाद पुनः करीब 30 वर्षों तक मिथिला में कोई केन्द्रीय शासन नहीं रहा। कोई महत्त्वपूर्ण शासक भी नहीं हुआ। छोटे-छोटे राज्य विभिन्न सरदारों के द्वारा स्थापित होते रहे। कुछ उल्लेखनीय राजाओं के नाम इस प्रकार हैं :- राजा पृथ्वीनारायण सिंह देव (1436-37 ई., चम्पारण में) राजा शक्तिसिंह देव , राजा मदनसिंह देव ,नृप नारायण- हुए ।
  सोलहवीं शताब्दी में चंपारण में पूर्ववत् एक और अर्द्ध स्वतंत्र राजकुल का अस्तित्व मिलता है -- 'बेतिया' अथवा 'सुगाँव' राजकुल।  इसके शासकों के नाम इस प्रकार हैं :- उग्रसेन सिंहगज सिंह (इन्हें शाहजहाँ ने 'राजा' की उपाधि दी थी। इनके पूर्ववर्ती सात पीढ़ियों के नाम मालूम हैं, परन्तु शासन की स्थापना इनके पिता ने ही की थी।) दिलीप सिंह , ध्रुव सिंह ,युगलकिशोर सिंह - 1773 ई. में। वीरकेश्वर सिंह आनन्दकेश्वर सिंह - 1816 में। (विलियम बेंटिक ने इन्हें 'महाराजा बहादुर' का विरुद दिया था।)नवलकेश्वर सिंह राजेन्द्रकेश्वर सिंह - 1855 में। सन् 1857 के विद्रोह में इन्होंने शाहाबाद के वीर कुअँर सिंह के विपरीत अंग्रेजों का साथ दिया। इसके पुरस्कारस्वरूप अंग्रेजों ने इन्हें और इनके पुत्र को भी 'महाराजा बहादुर' का विरुद दिया।हरेन्द्रकेश्वर सिंह (मृत्यु 1893 ई. में) इनकी बड़ी रानी की 1896 में मृत्यु के बाद राज 'कोर्ट ऑफ वार्ड्स' के अधीन चला गया।ओइनवार वंश के करीब 30 वर्ष बाद अकबर की कृपा से 'खण्डवाल कुल' को शासन-भार मिला और मिथिला में सर्वाधिक महत्त्व 'दरभंगा राज' को प्राप्त हुआ। छोटे-छोटे राजा (सरदार,जमींदार) अन्यत्र भी शासन चलाते रहे। दरभंगा-महाराज 'खण्डवाल कुल' के थे जिसके शासन-संस्थापक महेश ठाकुर थे। उनकी अपनी विद्वता, उनके शिष्य रघुनन्दन की विद्वता तथा महाराजा मानसिंह के सहयोग से अकबर द्वारा उन्हें राज्य की प्राप्ति हुई थी।.महेश ठाकुर - 1556-1569 ई. तक। इनकी राजधानी वर्तमान मधुबनी जिले के भउर (भौर) ग्राम में थी, जो मधुबनी से करीब 10 मील पूरब लोहट चीनी मिल के पास है।गोपाल ठाकुर - 1569-1581 तक। इनके काशी-वास ले लेने के कारण इनके अनुज परमानन्द ठाकुर गद्दी पर बैठे।.परमानन्द ठाकुर - (इनके पश्चात इनके सौतेले भाई शुभंकर ठाकुर सिंहासन पर बैठे।).शुभंकर ठाकुर - (इन्होंने अपने नाम पर दरभंगा के निकट शुभंकरपुर नामक ग्राम बसाया।) इन्होंने अपनी राजधानी को मधुबनी के निकट भउआरा (भौआरा) में स्थानान्तरित किया।.पुरुषोत्तम ठाकुर - शुभंकर ठाकुर के पुत्र पुरूषोतम ने  1617-1641 तक शासक थे । शुभंकर ठाकुर के सातवें पुत्र सुंदर ठाकुर - 1641-1668 तक।.महिनाथ ठाकुर - 1668-1690 तक। ये पराक्रमी योद्धा थे। इन्होंने मिथिला की प्राचीन राजधानी सिमराओं परगने के अधीश्वर सुगाओं-नरेश गजसिंह पर आक्रमण कर हराया था।.नरपति ठाकुर (महिनाथ ठाकुर के भाई) - 1690-1700 तक।.राजा राघव सिंह - 1700-1739 तक। (इन्होंने 'सिंह' की उपाधि धारण की।) इन्होंने अपने प्रिय खवास वीरू कुर्मी को कोशी अंचल की व्यवस्था सौंप दी थी। शासन-मद में उसने अपने इस महाराज के प्रति ही विद्रोह कर दिया। महाराज ने वीरतापूर्वक विद्रोह का शमन किया तथा नेपाल तराई के पँचमहाल परगने के उपद्रवी राजा भूपसिंह को भी रण में मार डाला। इनके ही कुल के एक कुमार एकनाथ ठाकुर के द्वेषवश उभाड़ने से बंगाल-बिहार के नवाब अलीवर्दी खान इन्हें सपरिवार बन्दी बनाकर पटना ले गया तथा बाद में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को कर निर्धारित कर मुक्त कर दिया। माना गया है कि इसी कारण मिथिला में यह तिथि पर्व-तिथि बन गयी और इस तिथि को कलंकित होने के बावजूद चन्द्रमा की पूजा होने लगी। मिथिला के अतिरिक्त भारत में अन्यत्र कहीं चौठ-चन्द्र नहीं मनाया जाता है।राजा विसुन सिंह - 1739-1743 तक।.राजा नरेन्द्र सिंह (राघव सिंह के द्वितीय पुत्र) - 1743-1770 तक। इनके द्वारा निश्चित समय पर राजस्व नहीं चुकाने के कारण अलीवर्दी खान ने पहले पटना के सूबेदार रामनारायण से आक्रमण करवाया। यह युद्ध रामपट्टी से चलकर गंगदुआर घाट होते हुए झंझारपुर के पास कंदर्पी घाट के पास हुआ था। बाद में नवाब की सेना ने भी आक्रमण किया। तब नरहण राज्य के द्रोणवार ब्राह्मण-वंशज राजा अजित नारायण ने महाराजा का साथ दिया था तथा लोमहर्षक युद्ध किया था। इन युद्धों में महाराज विजयी हुए पर आक्रमण फिर हुए।.रानी पद्मावती - 1770-1778 तक। राजा प्रताप सिंह (नरेन्द्र सिंह का दत्तक पुत्र) - 1778-1785 तक। इन्होंने अपनी राजधानी को भौआरा से झंझारपुर में स्थानान्तरित किया। .राजा माधव सिंह (प्रताप सिंह का विमाता-पुत्र) - 1785-1807 तक। इन्होंने अपनी राजधानी झंझारपुर से हटाकर दरभंगा में स्थापित की। लार्ड कार्नवालिस ने इनके शासनकाल में जमीन की दमामी बन्दोबस्ती करवायी थी। महाराजा छत्र सिंह - 1807-1839 तक। इन्होंने 1814-15 के नेपाल-युद्ध में अंग्रेजों की सहायता की थी। हेस्टिंग्स ने इन्हें 'महाराजा' की उपाधि दी थी।.महाराजा रुद्र सिंह - 1839-1850 तक।.महाराजा महेश्वर सिंह - 1850-1860 तक। इनकी मृत्यु के पश्चात् कुमार लक्ष्मीश्वर सिंह के अवयस्क होने के कारण दरभंगा राज को कोर्ट ऑफ वार्ड्स के तहत ले लिया गया। जब कुमार लक्ष्मीश्वर सिंह बालिग हुए तब अपने पैतृक सिंहासन पर आसीन हुए। महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह - 1880-1898 तक। ये काफी उदार, लोक-हितैषी, विद्या एवं कलाओं के प्रेमी एवं प्रश्रय दाता थे। रामेश्वर सिंह इनके अनुज थे।.महाराजाधिराज रामेश्वर सिंह - 1898-1929 तक। इन्हें ब्रिटिश सरकार की ओर से 'महाराजाधिराज' का विरुद दिया गया तथा और भी अनेक उपाधियाँ मिलीं। अपने अग्रज की भाँति ये भी विद्वानों के संरक्षक, कलाओं के पोषक एवं निर्माण-प्रिय अति उदार नरेन्द्र थे। इन्होंने भारत के अनेक नगरों में अपने भवन बनवाये तथा अनेक मन्दिरों का निर्माण करवाया। वर्तमान मधुबनी जिले के राजनगर में इन्होंने विशाल एवं भव्य राजप्रासाद तथा अनेक मन्दिरों का निर्माण करवाया था। यहाँ का सबसे भव्य भवन (नौलखा) 1926 ई. में बनकर तैयार हुआ था, जिसके आर्चिटेक डाॅ. एम.ए.कोर्नी थे। ये अपनी राजधानी दरभंगा से राजनगर लाना चाहते थे लेकिन कुछ कारणों से ऐसा न हो सका, जिसमें कमला नदी में भीषण बाढ़ से कटाई भी एक मुख्य कारण था। जून 1929 में इनकी मृत्यु हो गयी। ये भगवती के परम भक्त एवं तंत्र-विद्या के ज्ञाता थे।.महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह -पिता के निधन के बाद ये गद्दी पर बैठे। इन्होंने अपने भाई राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह को अपने पूज्य पिता द्वारा निर्मित राजनगर का विशाल एवं दर्शनीय राजप्रासाद देकर उस अंचल का राज्य-भार सौंपा था। 1934 के भीषण भूकम्प में अपने निर्माण का एक दशक भी पूरा होते न होते राजनगर के वे अद्भुत नक्काशीदार वैभवशाली भवन क्षतिग्रस्त हो गये। महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह के समय में ही भारत स्वतंत्र हुआ और जमींदारी प्रथा समाप्त हुई। देशी रियासतों का अस्तित्व समाप्त हो गया।
जानकी मन्दिर नेपाल के जनकपुर के केन्द्र में स्थित एक हिन्दू मन्दिर एवं ऐतिहासिक स्थल है। जानकी मंदिर देवी सीता को समर्पित है। मन्दिर की वास्तु हिन्दू-राजपूत वास्तुकला है। यह नेपाल  के जनकपुर में राजपूत स्थापत्यशैली में मंदिर निर्मित है और जनकपुरधाम भी कहलाता है। यह मन्दिर ४८६० वर्ग फ़ीट क्षेत्र में निर्मित विस्तृत है और इसका निर्माण १८९५ में आरंभ होकर १९११ में पूर्ण हुआ था।मन्दिर परिसर एवं आसपास ११५ सरोवर एवं कुण्ड हैं, जिनमें गंगासागर, परशुराम कुण्ड एवं धनुष-सागर अत्याधिक पवित्र कहे जाते हैं। जानकी मन्दिर, नेपाल की नेपाल के मानचित्र पर अवस्थित जानकी मन्दिर, नेपाल में निर्देशांक: 26°43′50″N 85°55′32″E / 26.73056°N 85.92556°E नेपाल देश के धनुषा जिले में है । जानकी मंदिर को नौलखा मन्दिर , ,जनकपुरधाम  ,नौ लाख का मन्दिर ,जानकी मन्दिर की ऊंचाई: 78 मी॰ (256 फीट) है । मंदिर में प्रमुख देवता:राम , प्रमुख देवी: सीता स्थापित है । जानकी नवमी , विवाह पंचमी, राम नवमी के अवसर पर प्रमुख त्योहार होते है । जानकी मंदिर की स्थापत्य शैली एवं संस्कृति हिन्दू, - राजपूत शैली में निर्मित १९११ ई. में मध्य भारत की टीकमगढ़ की महारानी वृषभानु कुमारी द्वारा किया गया था । माता सीता का जन्म स्थल  बिहार का सीतामढी और जनकपुर कर्म स्थल समाहित स्थल तीर्थस्थल स्वयंबर स्थल सीता कुंड अहिल्या स्थान है । जानकी मन्दिर का निर्माण मध्य भारत के टीकमगढ़ की रानी वृषभानु कुमारी के द्वारा १९११ ईसवी में करवाया गया था। इसकी तत्कालीन लागत नौ लाख रुपये थी। स्थानीय लोग इस कारण से ही इसे नौलखा मन्दिर भी कह दिया करते हैं। १६५७ में देवी सीता की स्वर्ण प्रतिमा यहां मिली थी और सीता माता विवाह पूर्व रहा करती थीं। इस स्थान की खोज एक संन्यासी शुरकिशोरदास ने की जब उन्हें यहां सीता माता की प्रतिमा मिली थी। असल में शुरकिशोरदास ही आधुनिक जनकपुर के संस्थापक भी थे। संत शुरकिशोर दास ने सीता उपासना के लिए सीता उपनिषद रचना कर  ज्ञान दिया था। राजा जनक ने जनकपुर स्थान पर शिव-धनुष के लिये तप किया था। जानकी मंदिर परिसर में भगवान राम माता सीता का विवाह मंडप  है । प्रचीन काल मे़ बिहार के गंगा के उतरी भाग को मिथिलांचल कहा जाता था ।मिथिलांचल में मिथि वंश का शासन था । यहां के राजाओं में राजा विशाल ने वैशाली नगर की स्थापना कर वैशाली प्रदेश का निर्माण किया था । राजा नीमी ने वैजयंत नगर की स्थापना की तथा मिथि ने मिथिला प्रदेश की नींव डाल कर वैजयंत नगर मे राजधानी रखा था । राजा जनक ने जनकपुर नगर की स्थापना कर मिथिला की राजधानी जनकपुर में रख कर प्रजा पालन करने लगे थे ।

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