मंगलवार, अक्तूबर 27, 2020

मानवीय जीवन : शक्ति का प्रादुर्भाव...


भारतीय धर्मग्रंथों , उपनिषदों, पुराणों तथा ज्योतिष ग्रंथों में मन्वन्तर के प्रारंभिक काल से दिनों, तिथियों और रीतुओं में शक्ति तथा देवों की प्रधानता दिया गया है । मगघ के मौर्य वंश के अंतिम शासक व्टहद्रथ की हत्या होने के बाद इसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने 185 ई.पू. मगध पर शुंग वंश की स्थापना कर ब्रह्मण धर्म फैलाया । शूंग शासकों द्वारा मगध की राजधानी विदिशा में स्थापित किया था । ईण्डो यूनानी शासक मिनांडर  को पराजित करने के बाद शुंग ने दो बार अश्वमेघ यग्य  पतंजलि द्वारा कराया गया । शुंग वंश का अंतिम शासक देवभूति  की ह्त्या कर 73 ई.पू. वासुदेव द्वारा की गयी तथा मगध की गद्दी पर कण्व वंश की स्थापना कर मगध पर अधिकार किया ।कण्व वंश के अंतिम राजा सुशर्मा को शिमुक द्वारा 60 ई.पू. सतवाहन वंश की स्थापना किया और आंध्र प्रदेश के प्रतिष्टानपुर  में मगध की राजधानी रखा था । सातवाहन वंश के शासक  सिमुक , शातकर्णि , गौतमी पुत्र  शातकर्णि ,वशिष्टी पुत्र  पुंलुमावी ,तथा यग्य श्री  शातकर्णि था । शातकर्णि द्वारा दो अश्वमेघ और एक राजसूय यग्य  कराया गया है । सातवाहन वंश के शासन के समय ग्रंथकार हाल की  गया सप्तशतक तथा गुणाढ्य ने  व्टहत्कथा पुस्तक की रचना की है । सातवाहन वंशियों को दछिण भरत में दछिनापथ के स्वामी कहा गया है । सतवाहनों की भाषा प्रक्टति मागधी भाषा तथा लिपि ब्राह्मी और चॉदी ,तॉबे ,सीसा तथा कासे की मुद्रा संचलन था । सातवाहन का समाज मात्टसतात्मक  था । आंध्र प्रदेश पर दो हज़ार वर्ष पूर्व सातवाहन राजवंश का शासन था। राजा सातवाहन वंश के राजा शतकर्णी  थे । शतकर्णि वंश के  कोचिपुत्र शतकर्णी और “गौतमीपुत्र शतकर्णी” द्वारा सिक्कों का प्रचलन कराया गया हैं। वाशिष्ठीपुत्र शतकर्णी द्वारा महाराष्ट्र के इलाके पर राज कर व्यापारिक मार्ग की स्थापना किया गया था। कण्व वंश के कमजोर पड़ने पर  सतवाहनों का उदय हुआ था। भरूच और सोपोर के रास्ते इनका रोमन साम्राज्य से व्यापारिक सम्बन्ध था। पहली शताब्दी के इनके सिक्के एक दुसरे कारण से भी महत्वपूर्ण होते हैं। शक्तिशाली हो रहे पहले शतकर्णी ने “महारथी” राजकुमारी नागनिका से विवाह किया था। नानेघाट पर एक गुफा के लेख में चर्चा है। महारथी नागनिका और शतकर्णी के करीब पूरे महाराष्ट्र पर शासन का जिक्र है। सिक्का  महारथी नागनिका के नाम  थीं। ई. पू. में सिक्कों पर ब्राह्मी लिपि में, सिक्कों के बीचो बीच “नागनिका” लिखा हुआ  है।  विश्व मे ब्रटिश सरकार द्वारा रानी विकटोरिया के नाम सिक्कों पर विक्टोरिया के नाम था और राजमाता अहिल्याबाई होल्कर वहीँ पास में रहती थीं।उनके बनवाए मंदिर अब भी उस इलाके में हैं। इस्लामिक हमलों में भग्न, उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक के करीब करीब सभी मंदिरों के जीर्णोद्धार का श्रेय राजमाता अहिल्याबाई को जाता है।  एक समय  उनके पुत्र मालोजी राव का रथ इस रास्ते से निकल रहा था और हाल ही में जन्मा एक बछड़ा उनके रथ के आगे आ गया। रथ रुका नहीं और टक्कर से बछड़े की मृत्यु हो गई। गाय वहीँ मृत बछड़े के पास बैठी थी कि वहां से राजमाता अहिल्याबाई का रथ गुजरा। उन्होंने रथ रोककर आवश्यक जानकारी लेने के बाद दरबार में पहुंची और मालोजी राव की पत्नी मेनाबाई से पूछा कि माँ के सामने ही बेटे को मार देने वाले की क्या सजा होनी चाहिए? मेनाबाई बोली, उसे तो प्राण दंड मिलना चाहिए। राजमाता अहिल्याबाई ने मालोजीराव के हाथ पैर बांधकर, जहाँ बछड़ा मरा था वहीँ डालने का आदेश दिया और कहा कि इसपर रथ चढ़ा दो! अब राजमाता ने बछड़े जैसा ही रथ की टक्कर से मारने का दंड तो दे दिया लेकिन कोई सारथी रथ चलाने को तैयार नहीं था। आख़िरकार राजमाता खुद ही रथ चलाने रथ में सवार हो गयी। राजमाता को रथ बढ़ाते ही रोकना पड़ गया, क्योंकि मालोजी को बचाने एक गाय बीच में आ गयी थी। राजमाता रथ बढ़ाती कि वही गाय फिर रथ के सामने आकर खड़ी हो जाती जिसका बछड़ा मलोजीराव के रथ से मारा गया था। बार-बार हटाये जाने पर भी गाय ने अड़कर मलोजीराव को बचा लिया।अपना बछड़ा खोकर भी उसे मारने वाले की जान बचाने पर अड़ जाने वाली इस गाय की वजह से इंदौर के इस बाजार का नाम “आड़ा बाजार” है। राजमाता अहिल्याबाई की न्याय से जन मानस खुश था । महारानी अहिल्याबाई उत्तर भारत के मंदिर को  बनवाया हुआ है। दिल्ली का कालकाजी मंदिर जिसे औरंगजेब ने तुड़वाया था, गया का विष्णुपद मंदिर, हरेक के जीर्णोद्धार में उनका योगदान रहा है।राजमाता अहिल्या बाई  , झासी  की रानी लक्ष्मीबाई, रानी चेनम्मा, रानी अब्बक्का जैसी अंग्रेजों की गुलामी से ठीक पहले की रानियों का जिक्र  है | युद्ध तलवारों से, तीरों से, भाले – फरसे जैसे हथियारों से लड़ा जाता था । प्रचीन काल में रानी के साथ साथ उनकी सहेलियों, बेटियों, भतीजियों, दासियों के भी युद्ध कौशल  , घुड़सवारी में पारंगत किया जाता था । युद्ध लड़ने के लिए, पहाड़ी और समतल, नदी और मैदानों में लड़ने के तरीके भी अलग अलग होते हैं | उन्हें सिखाने के लिए तो कागज़ कलम से सिखाने में लड़कियों को जाती थी | गुरुकुल होते थे !  महिलाएं युद्ध में पारंगत होती थी ।उत्तरी भारत में “दुर्गा सप्तशती” के पाठ की परंपरा है,  भारत के “ललिता सहस्त्रनाम” का पाठ किया जाता है। “दुर्गा सप्तशती” मार्कंडेय पुराण का हिस्सा है, “ललिता सहस्त्रनाम” ब्रह्माण्ड पुराण का हिस्सा है। भगवान विष्णु के हयग्रीव अवतार की अगस्त्य मुनि द्वारा ममिला में रचना रची  गयी थी। ललिता सहस्त्रनाम का राक्षस भण्ड प्रेम के प्रतीक है। मदन-दहन  - जब शिव ने कामदेव को भस्म किया तो उस राख से चित्रकर्म  ने मानवीय  प्रतिमा बनाई। शिव पर कामदेव का कोई प्रभाव नहीं होने से निराश ब्रह्मा ने उस समय “भण्ड, भण्ड” का उच्चारण किया जिससे उस जीवित उठी राक्षसमूर्ती का नाम भण्ड पड़ा है । अपने विपक्षी की आधी शक्ति सोख लेने का वर मिला था। शिव के क्रोध से उपजने के कारण उसकी शक्तियां तो विध्वंसक थी , वरदान मिलने के बाद भिण्ड द्वारा देवताओं को खदेड़कर खुद सब हथिया बैठा। भण्ड की राजधानी शोणितपुर था। शोणित का मतलब रक्त, या गहरा लाल रंग होता है। ललिता देवी से विवाह के लिए भगवान शिव ने कामेश्वर रूप धारण किया था। यहाँ विवाह के लिए ललिता देवी की शर्त थी कि वो जो भी कहें या करें उसके लिए उन्हें स्वतंत्रता होगी, किसी किस्म की रोकटोक नहीं होगी। ललिता  देवी तथाा भण्ड से युद्ध का समय  और अन्य शक्तियों के रथ  “यंत्रों” और “मंडलों” के स्वरुप में हैं। ललिता देवी का रथ चक्रराज नौ भागों में बंटा था और उसके अलग अलग भागों में अलग-अलग शक्तियां होती हैं। देवी की दो सेनानायिका मंत्रिणी और दंडनायिका (दंडनाथ) हैं और इनके रथों का विवरण भी कुछ ऐसा ही है। हिन्दुओं के लिए “काम” के अर्थ में पाने योग्य सभी वस्तुएं होती हैं, इसलिए दंडनाथ के हथियार हल और मुसल जैसे कृषि के औजार हैं। वहीँ दूसरी सेनानायिका मंत्रिणी के रथ के दूसरे भाग में प्रेम के भिन्न स्वरुप, रति, प्रीती और मनोज होते हैं।ललिता सहस्त्रनाम कितना महत्वपूर्ण है ये अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि श्री औरोबिन्दो की “सावित्री” के पहले भाग का पूरा एक अध्याय (तीसरा) देवी के ललिता सहस्त्रनाम से  मिलता  है। दूसरे तरीके से देखें  में से एक देवी की सेना को आलस्य के वशीभूत कर रहा होता है। एक दूसरा सबकुछ अंधकार से ढक देता है। किसी भी बड़े काम को करते समय चलो थोड़ी देर और सो लें का आलस्य भी होता है। मार्कंडेय पुराण “दुर्गा सप्तशती में ऋषि मार्कंडेय और जैमिनी के बीच का संवाद है। ऋषि मृकण्ड के पुत्र का अल्पायु होना तय था। तो पति-पत्नी ने बालक मार्कंडेय को उसका भविष्य बताया और कहा कि काल को रोकने का सामर्थ्य सिर्फ भगवान शिव में है, तो तुम उन्हीं की उपासना करो। संभवतः इससे तुम्हारी आयु कुछ बढ़ जाए, और जो न भी बढ़ी तो जो पुण्य होंगे उनका लाभ तो मिलेगा ही। तो ऋषि मार्कंडेय बचपन में ही ऋग्वेद के महामृत्युंजय मन्त्र (7.59.12) जो कि यजुर्वेद और अथर्ववेद में भी आता है, उसका जाप करने लगे।ऐसा माना जाता है कि वाराणसी में गंगा-गोमती संगम पर स्थित कैथी में  मार्कण्डेय महादेव मंदिर कहा गया है, यहॉ मार्कंडेय ऋषि उपासना करते थे। मारकण्बाडेय बारह वर्ष की आयु हुई तब यमदूत उन्हें शिवमंदिर से ले नहीं जा पाए और अंततः काल को स्वयं ही आना पड़ा। ऋषि मार्कंडेय शिवलिंग से लिपटे थे तो उनके पाश में भगवान शिव ही आ गए! महामृत्युंज के प्रभााव से मारकण्डेय की जान बचे थे ।  ललिता देवी के कामेश्वरी रूप से विवाह के लिए जो कामेश्वर रूप का वर था वो आड़े आ जाता है। विवाह इसी आधार पर हुआ था कि वो स्वतंत्र होंगी और उनके कुछ करने-बोलने पर कोई रोक-टोक नहीं होगी। भगवान शिव भी रोकने के बदले रास्ते में लेट जाते हैं। उनपर पैर पड़ते ही देवी जब देखती हैं कि पैर कहाँ रख दिया, तब वो स्तंभित होती हैं!जहाँ स्वयं भगवान शिव की ये स्थिति होती हो, वहां मनुष्यों की कैसी होती होगी? देवी के गले में जो आठ नरमुंड होते हैं वो बुद्धि को जकड़ने वाले आठ पाशों को दर्शाते हैं। ये काम (वासना), क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, लज्जा, भय और घृणा के पाश हैं। एक-एक करके इन पाशों को काटकर देवी अपने भक्तों को मुक्त करती हैं। रक्तबीज वध के प्रसंग में देवी का ऐसा ही रूप प्रदर्शित होता है। जैसे रक्तबीज के खून की बूँद जमीन पर गिरते ही बीज की तरह, उतना ही शक्तिशाली, दूसरा राक्षस उत्पन्न करती थी, इक्छाओं के साथ भी वैसा ही माना जाता है। एक इच्छा, बीज की तरह उतनी ही बलवती कोई दूसरी इच्छा को जन्म देती  है। कहा गया है कि 
त्वयेतद्धार्यते विश्वं त्वयेतत् सृज्यते जगत। त्वयेतत् पाल्यते देवी त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा ॥
सृजन और पालन का ही नहीं, प्रारंभ और अंत है , इसलिए  देवी के सबसे उग्र रूपों में एक है। महानिर्वाण तंत्र में भगवान शिव कहते हैं कि सबकुछ लीलने वाले काल का तुम भक्षण करती हो इसलिए तुम्हारा नाम महाकाली है, और सब तुमसे शुरू भी होता है इसलिए तुम्हारा नाम आद्या है। अब जहाँ से हम लोगों ने शुरू किया था, उन्हीं मार्कंडेय ऋषि के पास वापस चलें तो वो भृगु वंश के ऋषि थे। पूरी महाभारत भृगुवंशी ऋषियों की ही कहानियां कहती रहती है इसलिए वो महाभारत में भी आते हैं। यानी काली भी महाभारत में आती हैं। अश्वत्थामा शिवभक्त था और जब वो पांडवों के पुत्रों की हत्या करता है, तब देवी की चर्चा आती है।महाभारत में देवी के हाथ में पाश होता है, जिसमें वो जीवों को बांध लिए जाती हैं। आमतौर पर मूर्तियों में जब देवी को दर्शाते हैं तो उनके हाथ में कमल होता है पाश नहीं। कुछ लोग शिव में से “इ” की मात्रा हटाते हुए बताते हैं कि ऐसा करते ही शिव, शव हो जाते हैं। यहाँ “शव” का अर्थ द्रव्य हो जाता है और “इ” का अर्थ उर्जा है। बिना उर्जा के शिव भी कुछ नहीं कर सकते, यहाँ ऐसा भाव है। वैसे भौतिकी (फिजिक्स) की परिभाषा कहती है कि ये द्रव्य, उर्जा और उससे सम्बंधित नियमों का विज्ञान है। शिव-शक्ति की धर्मग्रंथों में चर्चा का कोई वैज्ञानिक आधार है या नहीं है, इस बारे में हम कुछ नहीं कहते।बाकी देवी काली, सनातनी देवी-देवताओं में सभवतः एकमात्र पूज्य देवी हैं जिनका जन्म सीधे क्रोध से होता है। हर व्यक्ति को उनके रूप सहज लगें ऐसा आवश्यक नहीं और कोई जबरदस्ती भी नहीं है। वैष्णव जैसे (शाकाहारी प्रकार की) मनोवृति के हो तो दूर से हाथ जोड़कर भी आगे बढ़ सकते हैं।आपने मशहूर फिल्म “अवतार” देखी होगी, तो उसके अंतिम दृश्य का युद्ध भी देखा ही होगा। “अवतार” नाम ही हिन्दुओं के देवी-देवताओं के अवतार से लिया गया है, तो जाहिर है फिल्म में कई हिस्से भी हिन्दुओं की पुराण-कथाएँ हैं। नरकासुर से लड़ाई में कृष्ण एक प्रहार से जब बेहोश हो जाते हैं तो सत्यभामा नरकासुर से लड़ने उतर पड़ती है और नरकासुर की छाती में तीर मार गिराती है। अंतः कृष्ण सत्यभामा के संयुक्त प्रयासों से नरकासुर मारा जाता है और कृष्ण उसका सर सुदर्शन चक्र से काट कर उसकी जीभ खंडित कर देते हैं। “अवतार” फिल्म के अंतिम दृश्य की लड़ाई में नायक का गिरना और नायिका का तीर चलाना इसी कहानी से प्रेरित है।नरकासुर की ग्यारह अक्षौहणी सेना इस युद्ध में मारी गई। इस सेना का सेनापति मुर नाम का था, और उसी के वध के कारण कृष्ण का एक नाम “मुरारी” भी होता है। कहते हैं, एक बार नरकासुर, देवी कामख्या से ही विवाह करने के पीछे पड़ गया। देवी ने शर्त रखी कि अगर रात भर में नीलांचल पहाड़ी के नीचे से ऊपर मंदिर तक की सीढ़ियाँ बना डालो तो मैं तुमसे विवाह कर लूं। नरकासुर फ़ौरन इस काम में जुट गया और जब देवी को लगा कि ये तो सचमुच सीढ़ी सुबह होने से पहले पूरी कर डालेगा तो उन्होंने एक मुर्गे को बांग देने का आदेश दिया। मुर्गा कुकडू कँे कर उठा और नरकासुर ने सोचा शर्त के मुताबिक मुर्गे के बांग देने से पहले सीढ़ी पूरी करनी थी ! तो वो आधे में ही, सीढ़ी बनाना बंद कर के चला गया। बाद में जब नरकासुर को पता चला तो उसने मुर्गे को खदेड़ के मार डाला। जिस जगह बेचारा मुर्गा मारा गया उसे दर्रांग जिले का कुक्कूड़काता माना जाता है। अधूरी सीढ़ी को अब मेखेलौजा पथ बुलाते हैं। संस्कृत-हिंदी शब्द “घोर”, भय का परिचायक है। सनातन मान्यताओं में बुढ़ापा, बीमारी, तनाव, अहंकार, मृत्यु का भय सभी घोर हैं। जब साधक शक्ति की कृपा से माया को पार कर जाता है और शिव के अघोर (घोर का ठीक उल्टा) स्थिति को पा लेता है तो उसे अघोरी कहते हैं। मृत्यु का भय सबसे बड़ा माना जाता है, इसलिए अघोरियों की साधना शमशानों में ही शुरू होती है। शमसान अगर उत्तर दिशा में बहती नदी के पास हो तो और भी बेहतर। बंगाल के तारापीठ में तो शाकाहारियों और मांसाहारियों का शमशान अलग-अलग भी हैं।शाक्त परम्पराओं के ऐसे ही साधकों के लिए कामख्या शक्ति पीठ का महत्व होता है। मान्यता है कि वामाचार की साधना इसी स्थल से कभी ऋषि वशिष्ठ ने आगे बढ़ानी शुरू की थी। कामख्या शक्ति पीठ, सती की योनी गिरने के स्थान पर बना है। साबर, नाथ या कालिकुल जैसे सम्प्रदायों में इसी वजह से कामख्या शक्तिपीठ की महत्ता और भी ज्यादा होती है। इसके गर्भगृह में कोई विग्रह (कोई मूर्ती) भी नहीं है, यहाँ भूमिगत गुफा जैसे स्थान में सतत जल प्रवाह होता रहता है। अम्बुबाची के चार दिनों के दौरान यहाँ पानी लाल हो जाता है। इसके किसी वैज्ञानिक कारण का मुझे पता नहीं, लेकिन इसे स्त्री के रजस्वला होने का प्रतीक माना जाता है। देवी का नहीं, ये भूदेवी यानि पृथ्वी के रजस्वला होने का प्रतीक है।इस दौरान कामख्या और असम के मंदिर ही नहीं, काशी तक के सभी शक्ति पीठ बंद रहते हैं। कुछ समय से ये 22 से 26 जून के बीच पड़ रहा है। करीब करीब मानसून और नयी फसल की बुआई से ठीक पहले प्रकृति के रजस्वला होने का ये प्रतीक असमय तो नहीं लगता है। इस दौरान यहाँ तांत्रिक, अघोरी, दशनामी, सहजिया से लेकर शंकराचार्य पीठ के सन्यासी और दूसरे सभी मतों-सम्प्रदायों के योगी-साधक भी मिल जाते हैं। वामाचार में थोड़ी भी रूचि रखने वालों के लिए ये सबसे बड़ा पर्व होता है। हालाँकि उनकी राजनीती विरोध पर ही टिकी होती है, किसी सुधार की बात नहीं करती फिर भी स्त्रियों के लिए चार दिनों छुट्टी हर महीने मांगने वालों को सनातन परम्पराओं में मौजूद इस चार दिन की छुट्टी को देखना चाहिए। इस मंदिर और उस से जुड़ी मान्यताओं का असम के इतिहास में भी ख़ासा महत्व रहा है। अहोम राजवंश दिल्ली की सल्तनतों से कहीं ज्यादा लम्बे समय तक चले थे, ये अलग बात है कि ब्रिटिश उपनिवेशवादी और उनकी किराये की कलम राजधानी के नाम से देश को जानने की परिपाटी चलाती रही है।तबाक़त ए नासिरी के हवाले से पता चलता है कि 1337 में एक लाख घुड़सवारों की फ़ौज को मुहम्मद शाह ने असम जीतने के लिए रवाना किया था। मगर इ.ए.गेट बताते हैं कि इस फ़ौज में से एक भी सिपाही नहीं लौटा। बाद में फिर जब औरंगजेब ने राजा राम कछवाहा और दुसरे सरदारों को असम पर हमला करने भेजने की कोशिश की तो कोई इस फ़ौज में भर्ती होने को तैयार ही नहीं होता था। आखिरकार सेना के साथ गुरु तेग बहादुर को ले जाया गया ताकि लोगों के मन से काले जादू का डर निकले। हालाँकि इस फ़ौज का भी हाल वही हुआ था, लोचित बोरफुकन (लोचित शायद लोकहित को कहा जाता होगा और फुकन सरदार होता है, यानि बोरफुकन सेनापति) ने खदेड़ खदेड़ कर मुग़ल और उसके पिट्ठुओं की फ़ौज को काटा था, लेकिन हाँ इस से ये जरूर हुआ कि गुरु तेगबहादुर के पहुँचने से असम में सिक्ख धर्म भी पहुंचा।शायद सरायघाट के युद्ध में मुगलों के कुचले जाने के दौर में ही कामख्या शक्तिपीठ और उस से जुड़ी तांत्रिक परम्पराओं की धाक जम गयी होगी। पिछली कई शताब्दियों से मनाये जा रहे इस त्यौहार की हिन्दुओं को जानकारी कम होने का कारण इसका अज्ञात या गुप्त होना नहीं है। इसकी वजह ये है कि हिन्दुओं में पास एक बड़ा मासूम सा सवाल होता है : “ये हिंदी में मिलेगा क्या?” आपकी सभ्यता-संस्कृति के बारे में अगर विदेशी भाषाओँ में जानकारी थी, और आपकी भाषा में नहीं थी तो सीखकर अनुवाद करना किसकी जिम्मेदारी होती थी? पड़ोसी देश से कोई आएगा क्या? अगर खुद सीख नहीं सकते तो किसी योग्य अनुवादक को ढूंढकर, उचित मानदेय पर उस से ये काम करवा लेने से किसने रोका था? आज जब अम्बुबासी का त्यौहार अपने अंतिम दिन पर है तो एक बार अपने सामुदायिक निकम्मेपन पर भी विचार कीजियेगा।बाकी ये याद रखियेगा कि हाल तक जो शाम ढले मंदिर से नीचे उतर आने की सलाह दी जाती थी, क्योंकि रात में डाकिनी, योगिनियाँ अपनी पद्दतियों से पूजा करती, वो भय भी “घोर” होता है। अघोर उस से आगे है!
भिमाक्षी भिषणे देवी सर्वभूताभयंकरी।
कराली विकराली च कामेश्वरी नमोस्तुते।। ( योगिनितंत् )
पर्वत की ऊँची चोटी के लिए संस्कृत में "शिखर", और उसे धारण करने वाले, यानी पर्वत के लिए “शिखरि” शब्द प्रयुक्त होता है। इसी का स्त्रीलिंग “शिखरिणी” हो जाएगा। इसी शब्द “शिखरिणी” का एक और उपयोग “सुन्दर कन्या” के लिए भी होता है। शिखरिणी संस्कृत काव्य का एक छन्द भी है। इसी शिखरिणी छन्द में आदि शंकराचार्य ने सौंदर्यलहरी की रचना की थी। संस्कृत जानने वालों के लिए, शाक्त उपासकों के लिए या तंत्र की साधना करने वालों के लिए सौन्दर्यलहरी कितना महत्वपूर्ण ग्रन्थ है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसकी पैंतीस से अधिक टीकाएँ, केवल संस्कृत में हैं। हिन्दी-अंग्रेजी भी जोड़ें तो पता नहीं गिनती कहाँ तक जाएगी।आदि शंकराचार्य के सौन्दर्यलहरी की रचना के साथ भी एक किम्वदंती जुड़ी हुई है। कहते हैं वो एक बार कैलाश पर्वत पर गए और वहां भगवान शिव ने उन्हें सौ श्लोकों वाला एक ग्रन्थ दिया। देवी के अनेक रूपों के वर्णन वाले ग्रन्थ को उपहार में पाकर प्रसन्न आदि शंकराचार्य लौट ही रहे थे कि रास्ते में उन्हें नन्दी मिले। नन्दी ने उनसे ग्रन्थ छीन लेना चाहा और इस क्रम में ग्रन्थ आधा फट गया! आदि शंकराचार्य के पास शुरू के 41 श्लोक रहे और बाकी लेकर नन्दी भाग गए। आदि शंकराचार्य ने वापस जाकर भगवान शंकर को ये बात बताई तो उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं, 41वें से आगे के श्लोकों को देवी की स्तुति में तुम स्वयं ही रच दो! तंत्र के साधकों का ये प्रिय ग्रन्थ दो भागों में बंटा हुआ है। पहले 41 श्लोक देवी के महात्म्य से जुड़े हैं और आनन्दलहरी के नाम से जाने जाते हैं। जहाँ से देवी के सौन्दर्य का बखान है उस 42वें से लेकर सौवें श्लोक को सौन्दर्यलहरी कहते हैं। अब जिस छन्द में ये रचा गया है उस “शिखरिणी” पर वापस चलें तो उसका पहला अर्थ पहाड़ की चोटी बताया जाता है। नन्दा देवी या वैष्णो देवी जैसी जगहों के बारे में सुना हो तो याद आ जायेगा कि देवी को पर्वत की चोटी पर रहने वाली भी बताया जाता है। दूसरे हिस्से के लिए अगर “शिखरिणी” का दूसरा अर्थ सुन्दर कन्या लें, तो नवरात्र में कन्या पूजन भी याद आ जायेगा।एंथ्रोपोलॉजिस्ट यानि मानवविज्ञानी जब धर्म का अध्ययन करते हैं तो उसे दो भागों में बांटने की कोशिश करते हैं। रिलिजन या मजहब के लिए संभवतः ये तरीका आसान होगा। वृहत (ग्रेटर) धारा में वो उस हिस्से को डालते हैं जिसमें सब कुछ लिखित हो और उस लिखे हुए को पढ़ने, समझने और समझाने के लिए कुछ ख़ास लोग नियुक्त हों। छोटी (लिटिल) धारा उसे कहते हैं जो लोकव्यवहार में हो, उसके लिखित ग्रन्थ नहीं होते और कोई शिक्षक भी नियुक्त नहीं किये जाते। भारत में धर्म की शाक्त परम्पराओं में ये वर्गीकरण काम नहीं करता क्योंकि आदि शंकराचार्य को किसी ने “नियुक्त” नहीं किया था। रामकृष्ण परमहंस या बाम-खेपा जैसे शाक्त उपासकों को देखें तो बांग्ला में “खेपा” का मतलब पागल होता है। इससे उनके सम्मान में कोई कमी भी नहीं आती, ना ही उनकी उपासना पद्दति कमतर या छोटी होती है।तंत्र में कई यंत्र भी प्रयोग में आते हैं। ऐसे यंत्रों में सबसे आसानी से शायद श्री यंत्र को पहचाना जा सकता है। सौन्दर्यलहरी के 32-33वें श्लोक इसी श्री यंत्र से जुड़े हैं। साधकों के लिए इस ग्रन्थ का हर श्लोक किसी न किसी यंत्र से जुड़ा है, जिसमें से कुछ आम लोगों के लिए भी परिचित हैं, कुछ विशेष हैं, सबको मालूम नहीं होते। शिव और शक्ति के बीच कोई भेद न होने के कारण ये अद्वैत का ग्रन्थ भी होता है। ये त्रिपुर-सुंदरी रूप की उपासना का ग्रन्थ है इसलिए भी सौन्दर्य लहरी है। कई श्लोकों में माता श्रृष्टि और विनाश का आदेश देने की क्षमता के रूप में विद्यमान हैं।इसके अंतिम के तीन-चार श्लोक (सौवें के बाद के) जो आज मिलते हैं, उन्हें बाद के विद्वानों का जोड़ा हुआ माना जाता है। उत्तर भारत में जैसे दुर्गा-सप्तशती का पाठ होता है वैसे ही दक्षिण में सौन्दर्यलहरी का पाठ होता है। शायद यही वजह होगी कि इसपर हिन्दी में कम लिखा गया है। इसपर दो अच्छे (अंग्रेजी) प्रचलित ग्रन्थ जो हाल के समय में लिखे गए हैं उनमें से एक रामकृष्ण मिशन के प्रकाशन से आता है और दूसरा बिहार योग केंद्र (मुंगेर) का है। दक्षिण और उत्तर में एक अंतर समझना हो तो ये भी दिखेगा कि सौन्दर्यलहरी में श्लोकों की व्याख्या और सम्बन्ध बताया जाता है। श्लोक का स्वरुप, उसके प्रयोग या अर्थ से जुड़ी ऐसी व्याख्या वाले ग्रन्थ दुर्गा सप्तशती के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं हैं।
 शाकंभरी - शाकम्भरी दुर्गा का एक नाम है, जिसका शाब्दिक अर्थ है शाक से जनता का भरण पोषण करने वाली। मार्कण्डेय पुराण के चण्डीस्तोत्र तथा वामन पुराण (अध्याय ५३) में देवी के शाकम्भरी नामकरण का यही कारण बताया गया है।इस प्राचीन देवी तीर्थ का संबंध शक्ति के उस रूप से है जिससे शाक या वनस्पति की वृद्धि होती है। सांभर के पास जिस पर्वतीय स्थान में शाकम्भरी देवी का मंदिर है वह स्थान कुछ वर्षों पहले तक जंगल की तरह था और घाटी देवी की बनी कहलाती थी। समस्त भारत में शाकम्भरी देवी का सर्वाधिक प्राचीन मंदिर यही है जिसके बारे में प्रसिद्ध है कि देवी की प्रतिमा भूमि से स्वतः प्रकट हुई थी।शाकम्भरी देवी की पीठ के रूप में सांभर की प्राचीनता महाभारत काल तक चली जाती है। महाभारत (वन पर्व), शिव पुराण (उमा संहिता) मार्कण्डेय पुराण आदि पौराणिक ग्रन्थों में शाकम्भरी की अवतार कथाओं में शत वार्षिकी अनावृष्टि चिन्तातुर ऋषियोंपर देवी का अनुग्रह शकादि प्रसाद दान द्वारा धरती के भरण पोषण की कथायें उल्लेखनीय है। वैष्णव पुराण में शाकम्भरी देवी के तीनों रूपों में शताक्षी, शाकम्भरी देवी का शताब्दियों से लोक में बहुत माहात्म्य है। सांभर और उसके निकटवर्ती अंचल में तो उनकी मान्यता है ही साथ ही दूरस्थ प्रदेशों से भी लोग देवी से इच्छित मनोकमना, पूरी होने का आशीर्वाद लेने तथा सुख-समृद्धि की कामना लिए देवी के दर्शन हेतु वहां आते हैं। प्रतिवर्ष भादवा सुदी अष्टमी को शाकम्भरी माता का मेला भरता है। इस अवसर पर सैंकड़ों कह संख्या में श्रद्धालु देवी के दर्शनार्थ वहां आते हैं। चैत्र तथा आसोज के नवरात्रों में यहां विशेष चहल पहल रहती है।शाकम्भरी देवी के मंदिर के समीप उसी पहाड़ी पर मुगल बादशाह जहांगीर द्वारा सन्‌ १६२७ में एक गुम्बज (छतरी) व पानी के टांके या कुण्ड का निर्माणकराया था, जो अद्यावधि वहां विद्यमान है।शाकम्भरी देवी के चमत्कार से संबंधित एक जनश्रुति है कि मुगल बादशाह औरंगजेब जब स्वयं शाकम्भरी देवी की मूर्ति तोड़ने के इरादे से वहां आया और प्रतिमा नष्ट करने का आदेश दिया तो असंख्य जहरीली मधुमक्खियों का झुण्ड उसकी सेना पर टूट पड़ा तथा सैनिकों को घायल कर दिया तब विवश हो औरंगजेब ने अपनी आज्ञा वापिस ली तथा देवी से क्षमा याचना की।सारतः शाकम्भरी देवी अपने आलौकिक शक्ति और माहात्म्य के कारण सैंकड़ों वर्षो से लोक आस्था का केन्द्र है।“चंडी पाठ” के अंतिम हिस्सों में आद्या शक्ति के पुनः प्रादुर्भाव और मनुष्यों एवं देवताओं पर उनकी कृपा की चर्चा आती है। हिरण्याक्ष नामक राक्षस के वंश में रुरु नाम के असुर का पुत्र दुर्गमासुर था। उसने वर्षों की कठिन तपस्या करके ब्रह्मा से वर में चारों वेद मांग लिए। कहते हैं कि वर के प्रभाव से जब वेद दुर्गमासुर के पास चले गए तो ऋषि-मुनि वेदों के बिना यज्ञ नहीं कर पाते थे। देवताओं के यज्ञ भाग से विहीन होने पर वर्षा बंद हो गयी और लोग अकालग्रस्त हो गए। ऐसे में देवताओं ने पूरे भुवन की स्वामिनी, देवी भुवनेश्वरी की उपासना की और देवी अपने शताक्षी रूप में प्रकट हुईं। जनता की दुर्दशा देखकर उनके सौ नेत्रों से आंसू बहने लगे और मान्यता है कि उनके रोते रहने के कारण नौ दिनों तक वर्षा होती रही। मनुष्यों के पास खाने पीने की वस्तुओं की कमी न हो इसलिए देवी शाकम्भरी रूप में भी प्रकट हुईं। संभवतः नवरात्र में शाकाहार की परम्परा आद्या शक्ति के इसी शाकम्भरी रूप के कारण है। देवी के नामों को देखने पर एक और भी चीज़ ध्यान में आती है। देवी जिन राक्षसों का वध करती हैं, उनका नाम लिए बिना आप देवी का नाम नहीं ले सकते। महिषासुरमर्दिनी कहने के लिए महिषासुर कहना होगा, दुर्गा कहने पर दुर्ग नाम आ जाता है, चंड-मुंड के वध के कारण चामुंडा नाम होता है। पापनाशिनी की शक्ति यहाँ दिखती है। देवी के अस्त्र-शस्त्रों से जो छू गया उसके पाप कहाँ बचे होंगे? कुछ ऐसे ही कारणों से वैष्णो देवी जाने पर भी ऊपर भैरव मंदिर तक जाकर पूजा की जाती है। सनातनी उसे दुत्कारते नहीं।भुवनेश्वरी सुनने पर ये भी ध्यान आ जायेगा कि इनके ही नाम पर तो भुवनेश्वर शहर का नाम है। ऐसा सिर्फ एक शहर के साथ हो रहा है ये भी मत सोचिये। चंडीगढ़ देवी चंडी के नाम पर, मुम्बई का नाम मुम्बा देवी के कारण, त्रिपुरा का नाम त्रिपुर सुंदरी के नाम पर है। पटना की नगर देवी पाटन देवी हैं, अम्बाला का नाम अम्बा से आता है, कश्मीर के श्रीनगर का नाम श्री यानी लक्ष्मी देवी के नाम पर है। मीरजा का मतलब समुद्र से जन्म लेने वाली यानि लक्ष्मी, उत्तरप्रदेश का मीरजापुर असल में मिर्ज़ापुर भी नहीं है।कर्णाटक के हसन का नाम हस्सनाम्बे के नाम पर है। भारत भर के ऐसे नामों की एक सूची इंडिया टेल्स की वेबसाइट पर मिल जाएगी जो उन्होंने पिछले साल लगाईं थी। ये भी सोचिये कि विविधता में एकता भारत का परिचय है क्या? इन सभी जगहों पर देवी की उपासना पद्दति अलग अलग है। एक की प्रक्रिया दूसरे से बिलकुल अलग हो सकती है। इन विविधताओं को हम बर्दाश्त (टोलरेट) नहीं करते, उनके प्रति सहिष्णुता नहीं दिखाते, बल्कि उन सब का सम्मान करते हैं।हमारी संस्कृति के दस किस्म के परिधान हो सकते हैं, साड़ी ही कई तरीके से पहनी जा सकती है। वो सबको एक ही बोरे में घुसकर बंद कर देना चाहते हैं। सांस्कृतिक उपनिवेशवाद (कल्चरल इम्पेरिअलिस्म) किसी भी किस्म की विविधता को बर्दाश्त नहीं कर सकता इसलिए उन्हें सबरीमाला, शनि मंदिर या ब्रह्मा के मंदिरों में एक सी पूजा पद्दति चाहिए। कल को वो ये भी कह सकते हैं कि नौ बालिकाओं के कन्या-पूजन में पुरुषों का अधिकार छिनता है इसलिए पांच कन्याओं के साथ चार बालकों की भी पूजा करो!निशाना एक ही हो तो उसपर प्रहार करना आसान हो जाता है। इस वजह से वो सह्लेश पूजा, सामा-चकेवा जैसी परम्पराओं को निर्ह्वन किया जाता है ।।  तंत्र या वामाचार मुश्किल है क्योंकि इसमें कई पाबंदियां झेलनी पड़ती हैं। जैसे देवी तारा की उपासना में महाशंख की माला का प्रयोग होता है। इस माला का स्पर्श तुलसी, गोबर, गंगा-जल और शालिग्राम से कभी नहीं करना चाहिये। थोड़े समय पहले तक भारत के घरों में आंगन, सामने की सड़क को गोबर से लीपने की परंपरा थी। तुलसी घर में होगी ही। गंगाजल छिडके जाने और शालिग्राम की भी कई जगह संभावना रहती है। यानि तकनिकी मजबूरियों की वजह से तांत्रिक किसी गृहस्थ के घर में प्रवेश भी नहीं कर सकता।देवी तारा, दस महाविद्याओं में से दूसरी होती है, उन्हें नीलसरस्वती, उग्रतारा, कामख्या आदि नामों से भी जाना जाता है। आदिशक्ति के इस स्वरुप की उपासना कौल तंत्र और बौद्ध वज्रायण में भी की जाती है। कम प्रचलित वाली कथाओं के हिसाब से एक बार जब देवताओं को शुम्भ और निशुम्भ ने पराजित कर के अमरावती से भगा दिया तो हिमालय पर वो देवी दुर्गा की उपासना कर रहे थे। उसी समय वहां मातंग ऋषि की पत्नी मातंगी आयीं। उन्होंने जब देवताओं से पूछा कि आप किसकी उपासना कर रहे हैं । देवताओं ने जवाब देने की कोशिश की, वो सही जवाब दे नहीं पाए। आखिर महासरस्वती मातंगी के शरीर से प्रकट हुई। सरस्वती जो मातंगी के शरीर से अलग हो गई थी, वो आठ भुजाओं वाली देवी गौर वर्ण कौशिकी थी। उनके अलग होने पर मातंगी का शरीर काला पड़ गया था और वो कालिका-उग्रतारा नाम की देवी हुई। तंत्र में सांध्यवंदना तारा को अर्पित होती है, सुबह की एकजाता, दोपहर की नीलसरस्वती, और संध्या की कामख्या के रूप को अर्पित होती है। तांत्रिक के हिसाब से शमशान वो जगह है जहाँ पञ्च तत्व, महाभूत' या देह में विद्यमान स्थूल तत्त्व, चिद्-ब्रह्म में विलीन होते हैं। तामसी गुण से सम्बद्ध रखने वाले देवी-देवता, देवी काली, तारा, भैरवी इत्यादि देवियाँ श्मशान भूमि को अपना निवास स्थान बनती हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से श्मशान, विकार रहित हृदय या मन का प्रतिनिधित्व करता हैं। जहाँ काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, स्वार्थ इत्यादि विकारों या व्यर्थ के आचरणों का दाह होता हैं देवी उसी स्थान को अपना निवास स्थान बनती हैं। मन या हृदय भी वह श्मशान हैं, जहाँ इन समस्त विकारों का दाह होता हैं। अतः देवी काली-तारा अपने उपासकों के विकार शून्य हृदय पर ही वास करती हैं।रुद्र्यामाला तंत्र के मुताबिक प्रजापति ब्रह्मा की आज्ञा से वसिष्ठ मुनि ने प्रागज्योतिषपुर में अपना आश्रम बनाया और कामख्या शक्ति पीठ के पास देवी तारा की मन्त्र साधना शुरू की। काफी लम्बे, बरसों के प्रयास के बाद भी जब मन्त्र सिद्ध नहीं हुआ, देवी भी प्रकट नहीं हुई। तो खीज कर वसिष्ठ मन्त्र को ही शापित करने चले, इतने में पार्वती अपने वज्रयोगिनी स्वरुप में वसिष्ठ के सामने आई और उनसे महाचीन जाकर साधना सीखने कहा। देवी की सलाह से जब वसिष्ठ बुद्ध के पास पहुंचे तो विष्णु अवतार को पंचमकार में लिप्त देखकर वो घृणा से भर उठे।लेकिन वशिष्ठ को पंचमकार का अर्थ समझाते हुए वाम साधना में बुद्ध ने दीक्षित किया। लौटने पर द्वारक नदी के किनारे एक शमशान चुनकर वसिष्ठ ने साधना दोबारा की और देवी तारा सद्योजात शिव के साथ प्रकट हुई और वशिष्ठ को आशीर्वाद दिया। जिस स्थान पर वशिष्ठ ने ये उपासना की थी, वो जगह अब बीरभूम (बंगाल) में है। यहाँ के मंदिर में देवी तारा अपने आदिरूप में हैं जिसे चार भुजाओं वाले एक चांदी के उग्रतारा के आवरण से ढक कर रखा जाता है। इसे सिर्फ ब्रह्म मुहूर्त में देख सकते हैं।देवी के तारा स्वरुप के भैरव का नाम अक्षोभ्य है। वो प्रत्यालीढ़ मुद्रा में खड़ी होती हैं, यानी योद्धाओं की तरह बायाँ पैर आगे शिव के अचेतन स्वरुप पर। देवी का वाहन गीदड़ या शव होता है। द्वितीय महाविद्या तारा की कृपा से साधक ज्ञानी हो जाता हैं। वाक् सिद्धि प्रदान करने से ये नील सरस्वती कही जाती हैं, सुख, मोक्ष प्रदान करने तथा उग्र आपत्ति हरण करने के कारण इन्हें ताराणी भी कहा जाता हैं। वशिष्ठ मुनि ने सबसे पहले देवी तारा कि आराधना की थी, इसलिए देवी ’वशिष्ठाराधिता’ के नाम से भी जानी जाती हैं।देवी तारा ज्ञान और मोक्ष की देवी हैं ।
देवी स्वरूप - भारतीय  ज्योतिष शास्त्रों  के अनुसार  तिथियों में  देवी शक्ति के साथ सम्‍मान मिला है।  राजस्‍थान में तो तीजां की सवारी निकलती है। चौथ माता! कितनी चौथ, करवा चौथ! पंचमी, पाची माता! छठ और छठ माता! ब्रज से लेकर उत्‍तरी भारत में छठमाता की पूजा होती है , दशा माता! चैत्र के कृष्‍ण पक्ष की दशमी को दशामाता की पूजा और दसों ही दिन तक पूजा  की परंपरा है। ग्‍यारस को  तारणी माता कहा गया है। तिथियों के साथ देवियों और देवों की प्रधानता हैं। गर्गसंहिता, शिवधर्मोत्‍तर पुराण, बृहत्‍संहिता, कालिका पुराण, विष्‍णुधर्मोत्‍तर पुराण, भविष्‍य पुराण, अग्नि पुराण, वह्निपुराण सहित मुहूर्त के लगभग सारे ही ग्रंथों यथा- ज्‍योतिष रत्‍नमाला, मुहूर्त तत्‍वम्, मुहूर्त चिन्‍तामणिं, एकलिंग पुराणों आदि ग्रंथों में तिथियों की चर्चा हैं। हेमाद्रि कृत चतुर्वर्ग चिंतामणि ( 1260 ई.) में तिथियों को भी देवियों को मानकर मूर्तियां बनाने का महत्वप्रण उलेख किया गया है। विश्‍वकर्मा शास्‍त्र तथा  हेमाद्रि ने 1260 ई. के चिंतामणि मों किया है। शुक्‍लपक्ष की प्रतिपदा की मूर्ति का रूप बताया है- द्विभुजा व अरुण वर्ण की होगी, मेष पर आरूढ होगी, शक्ति और पात्र उसके हाथ में होंगे- तिथयोह्यधुनोच्‍यन्‍ते प्रतिपद्दिभुजारूणा। मेषगा शक्ति पात्रा सा सितपक्षादिमा मता...। चतुर्थ दिवसे कुष्माण्डपुष्पात्...नवरात्र के चौथे दिवस देवी के कुष्माण्डा स्वरूप की महत्ता है। यह देवी प्रकृति से अभिन्न है और उसकी सृष्टि में कुष्माण्ड का पीतवर्ण पुष्प बृहत होता है और बृहत फल के आगमन का पूर्व संकेत है। वह स्त्री गुणोपम लज्जा से संपन्न होता है और लाजवंती की तरह अंगुली दिखाने से ही मुरझा जाता है। नवरात्र का रात्रि की अपेक्षा रात्र अर्थात् मार्ग, मत और समयावधि से आशय है। शाक्त मत को नौ जैसी पूर्ण संख्या वाला कहा है। पाञ्चरात्र, गणरात्र, शिवरात्र... के आशय कभी सम्बन्धित आगम में देखिए! ( काली शाबर तंत्र : श्री कृष्ण जुगनू, भूमिका) इस अवधि में इस पुष्प का खिलना और मिलना शुभ माना गया है। लोक जीवन में कुम्हड़ के फूल की अपनी महत्ता है। न छुआ जाता है न तोड़ा, जब नए नए फूल के आगमन की तैयारी होती है तो उस ओर जाना भी बन्द कर दिया जाता है। क्यों? उसके स्त्रीयोचित गुण में देवी भाव है, क्योंकि वह दायक है, दाता है, उदार होकर ऐसा बड़ा फल देता है जो आधे वर्ष से लेकर पूरे वर्ष तक भी ताजा रहता है। यानि जब तक नया फल नहीं आता, तब तक भी रखा जा सकता है। भले ही उसकी मातृ स्वरूपा लता सूख जाए। लता और मातृ शक्ति में बड़ी समानता है और अनेक गुण समान होते हैं।... लोक जीवन के प्रकृति प्रदत्त अनुभव ने प्रकृति की आराधना और उपासना का विधान किया है लेकिन श्लोक होकर वह अनुभव विशिष्ट अर्थ देने वाला हुआ है...!यवांकुर उगाना भी है देवी आराधना , मेवाड़ के देहात में नवरात्र को कहा जाता है : नौरतां। साल में दो नौरतां है : चेती और आसोजी।अधिक मास हो तो भी नौरतां उसी में होगी। इस बार अनेक जगह ऐसा हुआ। हर बार नौरतां बैठती हैं और उठती हैं। बैठनायानी ज्वारे बोना। यह जरूरी नहीं कि नौ दिनों की ही नौरतां हों। कहीं आठ, कहीं नौ, कहीं ग्यारह, कहीं तेरह तो कहीं पूर्णिमा को नौरतां उठती हैं। जब नौरता उठती है तो जवारों के पात्र सिर पर उठा कर सरोवर का मार्ग प्रशस्त किया जाता है और देवी आयुधधारी अपने पुरुष पुजारी में भावाविष्ट होकर अपने परायों को निर्भय करती हैं...।
कुल देवी  - वृक्षमूर्व्यां तथा वायौ व्योमे स्वर्गे च सर्वश:।एवं विधा त्वियं देवी सदा पूज्या विजानता।अप्येकं वेत्ति तो नाम धात्वर्थ निगमैर्नर:।स दु:खैर्वर्ज्जित: सर्वै: सदा पापाद्विमुच्यते।।(देवी पुराण 38, 100-102) , भारतीय परिवारों में कुल देवी की मान्यता लगभग वैसे ही रही है जैसे मिस्र में थी। ग्रीक परिवार भी कुल की रक्षा करने वाली शक्तियों में विश्वास करते थे। कुल देवियां हमारे घर - गुवाड़ के मूल द्वार की सूचक होती हैं। अधिकांश कुल देवियों के नाम ऐसे होते हैं, शास्त्रों में आहार, पानक, स्थान, स्थिति केवल लोक स्मृतियों के आधार पर होते हैं । देवियों के मूल जनजातीय होते हैं, कुछ प्रसंगों में शासकों के साथ विशेष रूप से देखने की जरूरत होती है, क्यों यह मान लिया गया है कि जो कुल देवी राजा की होगी, वही उनकी प्रजा की होगी।शाक, अमिष जैसे आहार, भोग, नैवेद्य, उनके पूजन की सभी तिथियां भी बहुत कुछ कहती हैं, तीज तिथि का नाम ही गौरी तिथि हो गया... क्यों और कब? देवियां वंश वल्लरी की मूल होती हैं, कभी माता से ही व्यक्ति को पहचाना जाता था, नामकरण मां के आधार पर ही होता था, देवताओं के नामकरण में भी इस मान्यता को मुहर लगाई गई है ... और उनके बारे में सबसे ज्यादा केवल कुल की वरिष्ठ महिलाएं ही जानती हैं ।इतना बड़ा अवसर आया है। नवरात्रियों में शक्ति संचय के लिए शक्ति आराधन कीजिए। सूक्ष्म में देखेंगे तो जानेंगे कि जो शक्ति संक्रामक महामारी बन कर व्यापक जनहानि के उद्योग में लगी है बिलकुल वही शक्ति हमारे प्रतिरक्षा तंत्र की भी स्वामिनी है।आराधन के लिए काल-विशेष का महत्व बताया गया है। जैसे पाञ्चरात्रादि में विष्णुरात्र, इन्द्ररात्र, ऋषिरात्र आदि। उपासना की दृष्टि से वर्ष में चार महारात्रियाँ शिवरात्रि, मोहरात्रि (जन्माष्टमी), महारात्रि (दीपावली) और कालरात्रि (होलिका-दहन) की विशेष प्रतिष्ठा है।भारतवर्ष में शरद और बसन्त ऋतुएं सदैव से ही रोगकारी प्राणघाती रही हैं। इन दुर्गम भयानक ऋतुओं को यम के दांतों के तुल्य कहा गया है। वैसे भी इस कालखण्ड में वरूण, यम तथा रूद्र की शक्तियाँ प्रकृति में प्रबल होती हैं। हालांकि यह दोनों ऋतुएँ मुझ अप्रसिद्ध पातकी को बहुत भाती हैं।ऋतुएँ मूलत: छ: हैं। वसंत, ग्रीष्म, पावस, वर्षा, शरद और शिशिर। ग्रीष्म ऋतु में रबी और शीत में खरीफ। रबी का गोधूम अग्नि खरीफ का भात सोम से पुष्ट होता है। अग्नि और चंद्र दोनों सूर्य से ऊर्जित होते हैं। सूर्य की ऊर्जा का धरती पर प्रकाश संश्लेषण बुध की सम्मिलित ऊर्जा से होता है। आद्या दुर्गा जिससे पहले कुछ न था, कोई नहीं था उसकी आराधना के लिए नौ दिन ही क्यों?  पहले आद्या नाम को ग्रहण करें। शास्त्र का प्रमाण है कि‘‘देवी ह्येकाग्रे आसीत्’’ तब कहीं कुछ भी नहीं था। अतः देवी को केवल अपनी ही छाया दिखाई दी। ‘‘एतस्मिन्नेव काले तु, स्वबिम्बं पश्यति शिवा’’ इसी स्वबिम्ब (छाया) से माया बनी जिससे मानसिक शिव हुए ‘‘तद्बिम्वं तु भवेन्माया-तत्र मानसिक शिवः’’सृष्टि रचना हेतु देवी ने इसी मानसिक शिव को अपने पति के रूप में स्वीकार करके सृष्टि रचना की। अब बात नवरात्र की उपपत्ति की। पाणिनीय सूत्र है ‘नवानां रात्रीणां समाहार: नवरात्रं। 'नवरात्र’ अर्थात नौ विशेष रात्रियों का समूह, अर्थात् –कालविशेष।  नौ की संख्या अखण्ड, अविकारी, एक रस,पूर्णब्रह्म की प्रतीक मानी गई है। नौ के पहाड़े से इस संख्या की पूर्णता को भलीभाँति समझा जा सकता है। नौ के पहाड़े की प्रत्येक संख्या का योग नौ ही होता है। दूसरा कारण यह कि तंत्रोक्त मण्डल पर प्रभाव के लिए ब्रह्मवर्चस्वी काल का चालीसवां हिस्सा आवश्यक है। तीन सौ साठ का चालीसवां हिस्सा है नौ। अर्थात कुल चालीस नवरात्र हुए। इन चालीस में चार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।एक वर्ष में दो अयन परिवर्तन की संधि और दो गोल परिवर्तन की संधियाँ होती है, कुल मिलाकर एक वर्ष में चार संधियाँ होती हैं,इनको ही नवरात्री के पर्व के रूप में मनाया जाता है| 1. प्रात:काल (गोल संधि) चैत्री नवरात्र 2. मध्यान्ह काल (अयन संधि) आषाढी नवरात्र , 3. सांयकाल (गोल संधि) आश्विन नवरात्र 4. मध्यरात्रि (अयन संधि) पौषी नवरात्र । क्रमश: चित्रा, पूर्वाषाढा, अश्विनी और पुष्य नक्षत्रों पर आधारित चान्द्रमासों में नवरात्रि पर्व का विधान है | वैदिक ज्योतिष में नाक्षत्रीय गुणधर्म के प्रतीक प्रत्येक नक्षत्र का एक देवता कल्पित किया हुआ है | इस कल्पना के गर्भ में भी विशेष महत्व समाया हुआ है, जो कि विचार करने योग्य है| इन चारों में भी चैत्र नवरात्र और विशेष हैं। चैत्र है 'मधु' और बैसाख है 'माधव' उधर वसंत है उमंग और फाल्गुन बीता सो हृदय को सौ सौ रसों से आप्लावित होने का समय है। और जब सनातन हृदय रसाप्लावित हुआ तो उसने आराधना का मार्ग चुना। समर्पण समर्पयामि का भाव चुना। और जगज्जननी दुर्गा का तो एक नाम भी वासन्ती है। दुर्गोत्सव विवेक नामका एक ग्रंथ है महामहोपाध्याय शूलपाणि भट्टाचार्य का लिखा। संस्कृत में है। लिखते हैं कि ' विशेषत्वयं बोधनं नास्ति। बोधिताया बोधनासम्भवात्। वासंती नवरात्र में त्रिगुणात्मिका देवी स्वयं जाग्रत रहती हैं इसलिए बोधन की आवश्यकता ही नहीं। अब फिर से आते हैं नौ की संख्या पर। यज्ञोपवीत में भी नौ गुण पूर्णब्रह्म के भी नौ गुण। नौ की चमत्कारिक संख्या की पूर्णता का प्रमाण देखिए कि शक्ति साधन से नौ ही गुण प्राप्त होने के अधिकारी भी बनते हैं।शम, दम, तप,शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता– इन नौ गुणों से युक्त व्यक्ति ही शक्तिशाली कहा गया है। भगवान परशुराम में इन नौ गुणों का पूर्ण समावेश  होने से ही उन्होंने पृथ्वी के समस्त राजाओं पर विजय प्राप्त की । विजया-दशमी- (क) शक्ति के १० रूप-यह शक्ति की पूजा है। विश्व का मूल स्रोत एक ही है पर वह निर्माण के लिये २ रूपों में बंट जाता है, चेतन तत्त्व पुरुष है, पदार्थ रूप श्री या शक्ति है। शक्ति माता है अतः पदार्थ को मातृ (matter) कहते हैं। सभी राष्ट्रीय पर्वों की तरह यह पूरे समाज के लिये है पर क्षत्रियों के लिये मुख्य है, जो समाज का क्षत से त्राण करते हैं-क्षतात् किल त्रायत इत्युदग्रः शब्दस्य अर्थः भुवनेषु रूढः। (रघुवंश, २/५३) , वेद में १० आयाम के विश्व का वर्णन है अतः दश, दशा, दिशा-ये समान शब्द हैं। १० आयाम कई प्रकार से हैं-(१) ५ तन्मात्रा = भौतिक विज्ञान में माप की ५ मूल इकाइयां। इनके सीमित और अनन्त रूप ५-५ प्रकार के हैं। (२) आकाश के ३ आयाम, पदार्थ, काल, चेतना या चिति, ऋषि (रस्सी-दो पदार्थों में सम्बन्ध), वृत्र या नाग (गोल आवरण), रन्ध्र (घनत्व में कमी-बेशी, आनन्द या रस। (३) ३ गुणों (सत्व, रज, तम) के १० प्रकार के समन्वय-क, ख, ग,कख, खक, कग, गक, खग, गख, कखग। (ख) महाविद्या-१० आयाम की तरह १० महा-विद्या हैं, जो ५ जोड़े हैं-  काली-काला रंग, तारा-श्वेत। त्रिपुरा के २ रूप-सुन्दरी, भैरवी (शान्त, उग्र)। कमला-विष्णु-पत्नी, स्थायी सम्पत्ति, युवती, सुन्दर, रोहिणी नक्षत्र, इन्द्र-लक्ष्मी-कुबेरधूमावती-विधवा, चञ्चल-दुष्ट, वृद्धा, कुरूप, ज्येष्ठा नक्षत्र, वरुण-अलक्ष्मी-यम। भुवनेश्वरी भुवन का निर्माण करती है, छिन्नमस्ता काटती है। मातङ्गी वाणी को निकालती है, बगलामुखी (वल्गा = लगाम) रोकती है।१० महाविद्या के आयाम हैं-  तारा-शून्य विन्दु, इसकी दिशा रेखा रूप में प्रथम आयाम। भैरवी-उग्र रूप-सतह रूप में दूसरा आयाम। ,  त्रिपुरा-३ आयाम। भुवनेश्वरी-भुवन का निर्माण-४ मुख के ब्रह्मा की तरह। काली-काल रूप में ५वां आयाम। परिवर्तन का आभास काल है। कमला-विष्णु चेतना रूप में ६ठा आयाम, उनकी पत्नी।बगलामुखी-वल्गा, रस्सी, एक रोकता है, दूसरा जोड़ता है। मातङ्गी=हाथी, वृत्र घेरकर कता है, हाथी को रोकना (वारण) कठिन है ,छिन्नमस्ता-काटना रन्ध्र बनाता है। धूमावती-१०वां आयाम अस्पष्ट है, धूम  हैं ।  देवी का रूप -  कालीी -पूर्ण विश्व, जिसमें १ खर्व ब्रह्माण्ड तैर रहे हैं। तारा-ब्रह्माण्ड के तारा। त्रिपुरा (षोड़शी)-सूर्य के तेज से यज्ञ हो रहा है, यह १६ कला का पुरुष है, क्रिया षोड़शी है। भुवनेश्वरी-क्रन्दसी (ब्रह्माण्ड) तथा रोदसी (सौर मण्डल) के बीच में सूर्य।छिन्नमस्ता-सूर्य से निकला तेज।भैरवी-निर्माण में लगी शक्ति।धूमावती-बिखरी शक्ति जिसका प्रयोग नहीं हुआ।बगलामुखी-पृथ्वी द्वारा रोकी या शोषित शक्ति। मातङ्गी-सूर्य के विपरीत दिशा में पृथ्वी का रात्रि भाग। कमला-पृथ्वी पर की सृष्टि। ,आध्यात्मिक रूप-शरीर के चक्रों में इनका स्थान है- काली-यह मूलाधार में सोयी हुई कुण्डलिनी शक्ति है। ,तारा-स्वाधिष्ठान चक्र का समुद्र और चन्द्रमा है। पश्यन्ती वाक् के रूप में यह तारा है। इसका देवता राकिनी है जो तारक मन्त्र रं (राम) है। ,त्रिपुर सुन्दरी-यह सहस्रार में १६ कला के चन्द्र जैसा विहार करती है। वहां सुधा-सिन्धु भौतिक रूप में मस्तिष्क का द्रव है । , भुवनेश्वरी-बीज मन्त्र ह्रीं है जिसका अर्थ हृदय है। यह हृदय के अनाहत चक्र के नीचे चिन्तामणि पीठ पर विराजमान है, इसके सभी रूप भुवनेश्वर में हैं, अतः इस नगर का यह नाम है- ,सुधा-सिन्धोर्मध्ये सुर-विटप-वाटी परिवृते, मणिद्वीपे नीपो-पवन-वति चिन्तामणि गृहे। ,शिवाकारे मञ्चे परम शिव पर्यङ्क निलयां, भजन्ति त्वां धन्याः कतिचन चिदानन्द लहरीम्॥ (सौन्दर्य लहरी, ८) ,सुधा-सिन्धु = बिन्दुसागर। मणिद्वीप-उसके निकट लिङ्गराज। नीप (वट वृक्ष) का उपवन-मूल = बरगढ़, तना -यज्ञाम्र = जगामरा, मुण्ड = बरमुण्डा, द्रुम से द्रुम = दुमदुमा। चिन्तामणि गृह = चिन्तामणीश्वर। शिव रूपी मञ्च = मञ्चेश्वर। परमशिव = लिङ्गराज। त्रिपुरा भैरवी-मूलाधार में कुण्डलिनी का जाग्रत रूप।,  छिन्नमस्ता-आज्ञा चक्र में ३ नाड़ियों का मिलन-इड़ा, पिङ्गला, सुषुम्ना। ,(७) धूमावती-मूलाधार के धूम्र रूप स्वयम्भू लिङ्ग को घेरे हुये। ,बगलामुखी-कण्ठ में वाणी तथा प्राण का नियन्त्रण-जालन्धर बन्ध द्वारा। , (९) मातङ्गी-यह कण्ठ के ऊपरी भाग में है, जहां से वाणी निकलती है।, कमला-यह नाभि का मणिपूर चक्र है जिसे मणि-पद्म कहते हैं। ,(ग) नवरात्रि- नवम आयाम रन्ध्र या कमी है जिसके कारण नयी सृष्टि होती है, अतः नव का अर्थ नया, ९-दोनों है-नवो नवो भवति जायमानो ऽह्ना केतुरूपं मामेत्यग्रम्। (ऋक् १०/८५/१९) ,सृष्टि का स्रोत अव्यक्त है, उसे मिलाकर सृष्टि के १० स्तर हैं , जिनक् दश-होता, दशाह, दश-रात्रि आदि कहा गया है-  ,यज्ञो वै दश होता। तैत्तिरीय ब्राह्मण २/२/१/६) , विराट् वा एषा समृद्धा, यद् दशाहानि। (ताण्ड्य महाब्राह्मण ४/८/६) विराट् वै यज्ञः। ...दशाक्षरा वै विराट् । (शतपथ ब्राह्मण १/१/१/२२, २/३/१/१८, ४/४/५/१९), विराट् एक छन्द है जिसके प्रति पाद में १० अक्षर हैं। पुरुष (मनुष्य या विश्व) का कर्त्ता रूप भी अक्षर है, जो १० प्रकार से कार्य करता है-, अन्तो वा एष यज्ञस्य यद् दशममहः। (तैत्तिरीय ब्राह्मण २/२/६/१), अथ यद् दशरात्रमुपयन्ति। विश्वानेव देवान्देवतां यजन्ते। (शतपथ ब्राह्मण १२/१/३/१७ ), प्राणा वै दशवीराः। (यजु १९/४८, शतपथ ब्राह्मण १२/८/१/२२) वर्ष के ३६० दिनों में ४० नवरात्र होंगे। अतः यज्ञ के वेद यजुर्वेद में ४० अध्याय हैं, तथा ४० ग्रह हैं (ग्रह = जो ग्रहण करे)- यद् गृह्णाति तस्माद् ग्रहः। (शतपथ ब्राह्मण १०/१/१/५)षट् त्रिंशाश्च चतुरः कल्पयन्तश्छन्दांसि च दधत आद्वादशम्। यज्ञं विमाय कवयो मनीष ऋक् सामाभ्यां प्र रथं वर्त्तयन्ति। (ऋक् १०/११४/६)४० नवरात्रके लिये महाभारत में युद्ध के बाद ४० दिन का शोक बनाया गया था, जो आज भी इस्लाम में चल रहा है। इस्लाम धर्म में वर्ष में चन्द्रमा की १३ परिक्रमा के लिये १३ दिन का शोक मनाते हैं। ४० वॉ मनाते है । सनातन के चार  नवरात्रों में मुख्य हैं-  दैव नवरात्र सूर्य उतरायण के समय पर होता है ।आन्ध्र प्रदेश के वोंतीमिट्टा का कोदंडारामा मंदिर तथा लेपाक्षी का नंदी ,  तिरूमाला का वेंकटेश्वरा मंदिर , पापी पर्बत, अरकू घाट प्रसिद्ध है । महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा, पूर्व में बंगाल की खाड़ी, दक्षिण में तमिल नाडु और पश्चिम में कर्नाटक है।  आन्ध्र प्रदेश  राज्य में दो प्रमुख नदियां, गोदावरी और कृष्णा बहती हैं। पुदु्चेरी (पांडीचेरी) राज्य के यानम जिले का छोटा अंतःक्षेत्र 12 वर्ग मील (30 वर्ग कि॰मी॰)) तथा राज्य के उत्तरी-पूर्व में स्थित गोदावरी डेल्टा में है।ऐतरेय ब्राह्मण ..800  ई .पू.  और महाभारत जैसे संस्कृत महाकाव्यों में आन्ध्र शासन का उल्लेख किया गया है । नाट्यशास्त्र (ई.पू. पहली सदी) में  "आन्ध्र" जाति का उल्लेख किया गया है।भट्टीप्रोलु में पाए गए शिलालेखों में तेलुगू भाषा की जड़ें खोजी गई हैं। चंद्रगुप्त मौर्य (ई.पू. 322-297) के न्यायालय का दौरा करने वाले मेगस्थनीस ने उल्लेख किया है कि आन्ध्र देश में 3 गढ़ वाले नगर और 100,000 पैदल सेना, 200 घुड़सवार फ़ौज और 1000 हाथियों की सेना थी। बौद्ध पुस्तकों से प्रकट होता है कि उस समय आन्ध्रवासियों ने गोदावरी क्षेत्र में अपने राज्यों की स्थापना की थी। अपने 13वें शिलालेख में अशोक का है। आन्ध्र में कुबेरका द्वारा शासित एक प्रारंभिक राज्य था,जिसकी राजधानी प्रतिपालपुरा (भट्टीप्रोलु) थी। धान्यकटकम ,धरणीकोटा (वर्तमान अमरावती) महत्वपूर्ण स्थान रहे हैं, जिसका गौतम बुद्ध ने भी दौरा किया था। प्राचीन तिब्बती विद्वान तारानाथ के अनुसार: "अपने ज्ञानोदय के अगले वर्ष चैत्र मास की पूर्णिमा को बुद्ध ने धान्यकटक के महान स्तूप के पास 'महान नक्षत्र' (कालचक्र) मंडलों का सूत्रपात किया। मौर्यों ने ई.पू. चौथी शताब्दी में अपने शासन को आन्ध्र तक फैलाया। मौर्य वंश के पतन के बाद ई.पू. तीसरी शताब्दी में आन्ध्र शातवाहन स्वतंत्र हुए. 220 ई.सदी में शातवाहन के ह्रास के बाद, ईक्ष्वाकु राजवंश, पल्लव, आनंद गोत्रिका, विष्णुकुंडीना, पूर्वी चालुक्य और चोला ने तेलुगू भूमि पर शासन किया। तेलुगू भाषा का शिलालेख प्रमाण, 5वीं ईस्वी सदी में रेनाटी चोला (कडपा क्षेत्र) के शासन काल के दौरान मिला। [25] इस अवधि में तेलुगू, प्राकृत और संस्कृत के आधिपत्य को कम करते हुए एक लोकप्रिय माध्यम के रूप में उभरी.[26] अपनी राजधानी विनुकोंडा से शासन करने वाले विष्णुकुंडीन राजाओं ने तेलुगू को राजभाषा बनाया। विष्णुकुंडीनों के पतन के बाद पूर्वी चालुक्यों ने अपनी राजधानी वेंगी से लंबे समय तक शासन किया। पहली ईस्वी सदी में ही चालुक्यों के बारे में उल्लेख किया गया कि वे शातवाहन और बाद में ईक्ष्वाकुओं के अधीन जागीरदार और मुखिया के रूप में काम करते थे। 1022 ई. के आस-पास चालुक्य शासक राजराज नरेंद्र ने राजमंड्री पर शासन किया। पल्नाडु की लड़ाई के परिणामस्वरूप पूर्वी चालुक्यों की शक्ति क्षीण हो गई और 12वीं और 13वीं सदी में काकतीय राजवंश का उदय हुआ। काकतीय, वरंगल के छोटे प्रदेश पर शासन करने वाले राष्ट्रकूटों के प्रथम सामंत थे। सभी तेलुगू भूमि को काकतीयों ने एकजुट किया। 1323 ई. में दिल्ली के सुल्तान ग़ियास-उद-दिन तुग़लक़ ने उलघ ख़ान के तहत तेलुगू देश को जीतने और वारंगल को क़ब्जे में करने के लिए बड़ी सेना भेजी. राजा प्रतापरुद्र बंदी बनाए गए। 1326 ई. में मुसुनूरी नायकों ने दिल्ली सल्तनत से वारंगल को छुड़ा कर उस पर पुनः क़ब्जा किया और पचास वर्षों तक शासन किया। उनकी सफलता से प्रेरित होकर, वारंगल के काकतीयों के पास राजकोष अधिकारियों के तौर पर काम करने वाले हरिहर और बुक्का ने विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की, जो कि आन्ध्र प्रदेश और भारत के इतिहास में सबसे बड़ा साम्राज्य है।1347 ई. में दिल्ली सल्तनत के ख़िलाफ़ विद्रोह करते हुए अला-उद-दीन हसन गंगू द्वारा दक्षिण भारत में एक स्वतंत्र मुस्लिम राष्ट्र, बहमनी राज्य की स्थापना की गई। 16वीं सदी के प्रारंभ से 17वीं सदी के अंत तक लगभग दो सौ वर्षों के लिए कुतुबशाही राजवंश ने आन्ध्र देश पर आधिपत्य जमाया था ।औपनिवेशिक भारत में, उत्तरी सरकार ब्रिटिश मद्रास प्रेसिडेंसी का हिस्सा बन गया था ।
शक्ति की उपासना मानव जीवन का प्रारंभ तथा अंत है ।शक्ति की आराधना विभिन्न रूपों मे की गयी है । पुरातन काल मे पार्वती - शिव , लछ्मी - नारायण , सीताराम , राधा क्टष्ण , ब्रह्माणी , श्रीश: में शक्ति जुडा है ।



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