शनिवार, अक्तूबर 24, 2020

मगध : मॉ तारा और ईस्टेट...

                 
                 
                       मगध का टिकारी स्टेट में विकासशील नीति अपनाकर  वीर सिंह द्वारा टिकारी राज की नींव डाल कर टिकारी में मुख्यालय की स्थापना की गयी थी । वीर सिंह द्वारा कई धार्मिक स्थलों का निर्माण तथा जीर्णोद्धार कराया गया । गया जिला मुख्यालय गया से 35 किमी पर टिकारी अनुमंडल का मुख्यालय टिकारी अवस्काथित है । टिकारी  से 11 किमी. उत्तर  केसपा ग्राम में मां तारा देवी  मंदिर स्थित है। चैत्र मास की वासंती नवरात्र तथा आश्विन माह  की शारदीय नवरात्र में मां तारा देवी की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। नवरात्र के  अवसर पर श्रद्धालुओं व भक्तजनों द्वारामाता तारा देवी के समक्ष घी के दिए 9 दिनों  तक निरंतर जलाते हैं ।  नवमी के मध्य रात्रि में यहाँ निसवाली पूजा होती है ।  तारा मंदिर में माता तारा की मूर्ति धार्मिक और लोक आस्था का महाकेन्द्र माना जाता है।  समुद्र मंथन से निकले विष को लोक कल्याण के लिए भगवान शिव पी लिए और उसके प्रभाव से अचेतन हो गए तब तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। तभी मां तारा देवी प्रकट हुई और भगवान शिव को अपनी गोद में लेकर अपना दूध पिलाने लगी। दूध के प्रभाव से विष समाप्त हो गया और तभी से मां तारा की जय जयकार तीनों लोकों में होने लगी और उनकी पूजा अर्चना होने लगी।  कश्यप ऋषि के नाम पर केसपा है। कश्यप ऋषि का प्राचीन  आश्रम  तथा माता तारा की मूर्ति स्थापित कर शाक्त संप्रदाय का उपासना स्थल था । मां तारा देवी और मंदिर की स्थापना स्कंद गुप्त काल में कच्ची मिट्टी और गदहिया ईट से निर्मित मंदिर के गर्भ गृह की दीवार 4-5 फीट मोटी है। गर्भ गृह की सुन्दर नक्काशिया मंदिर में प्रवेश करने वाले श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। गर्भ गृह में विराजमान मां तारा देवी की उतर विमुख 8 फीट उंची आदमकद प्रतिमा काले पत्थर की बनी  अद्भुत कलाकृति है। मां तारा के दोनों ओर दो यागिनिया खड़ी है। प्रतिमा पर प्राकृत भाषा में कई लेख उत्कीर्ण है जिसे आज तक पढ़ा नही जा सका है। मंदिर के चारों ओर एक बड़ा चबूतरा है। केसपा में स्थित माता वाम तारा विराजमान है । आश्विन में शारदीय नवरात्र और चैत में बसंती नवरात्र के अवसर पर श्रद्धालुओं की अपार भीड़ यहा जुटती है। बाहर से आए श्रद्धालु 9 दिनों तक मंदिर परिसर में रहकर नवरात्र का पाठ करते हैं। इस दौरान बहुत सारे श्रद्धालु अपने जीवन में सुख, शाति और समृद्धि के लिए अखण्ड दीप जलाते हैं। जो नौ दिनों तक अनवरत जलते रहता है। यहा एक त्रिभुजाकार विषाल हवन कुण्ड है जिसमें सालों भर आहुति डाली जाती है आस्था और विश्वास का केन्द्र माना जाने वाली मां तारा देवी के दर्शन हेतु श्रद्धा स्थल केसपा गाँव मे स्थित माँ तारा देवी की मंदिर है । मां तारा स्थल को  लोक आस्था तथा  शक्तिपीठ माना जाता है । केसपा गाँव महर्षि कश्यप मुनि का साधना और कर्म स्थल और  कश्यप ऋषि के अराध्य देवी माता तारा  थी । महर्षि कश्यप मुनि के द्वारा ही माता तारा का मंदिर बनवाया गया है । केसपा स्थल महर्षि कश्यप  से जुड़ाव  है । केसपा  गांव का प्राचीन नाम कश्यप पुरी , कश्यपा रहा है । गया जिला से लगभग 37 किमी और टिकारी शहर से 12 किमी. उतर अवस्थित प्रसिद्ध मां तारा देवी के मंदिर  अवस्थित है ।ब्रह्माण्ड कल्याण के लिए  समुद्र मंथन आरम्भ हुआ था । भगवान कच्छप के एक लाख योजन चौड़ी पीठ पर मन्दराचल पर्वत घूमने लगा ।  समुद्र मंथन से हलाहल विष निकला था । विष की ज्वाला से सभी देवता तथा दैत्य जलने लगे, उनकी कान्ति फीकी पड़ने लगी और मूर्क्षित होने लगे थे । हलाहल को रोकने के लिए देव तथा दानवों द्वारा  भगवान शंकर की प्रार्थना कीगई थी । उनकी प्रार्थना पर महादेव जी उस विष को हथेली पर रख कर उसे पी गये किन्तु उन्होंने उस विष को कण्ठ से नीचे नहीं उतरने दिया । उस विष के प्रभाव से शिव जी का कण्ठ नीला पड़ गया और वह अर्ध निद्रा में हो गए ।अब क्या होगा. उस समय पुरे जगत में चारों ओर हाहाकार मच गया की महादेव को क्या हो गया है मानव ,दानव देव , जीव , जंतु विह्वल थे । तभी मां तारा प्रकट हुईं. माता आईं और छोटे बालक की तरह महादेव को गोद में उठा लिया । फिर मां तारा ने महादेव को अपना दूध पिलाया । दूध पीते ही महादेव की अर्ध निद्रा टूट गई और महादेव ने मां तारा को प्रणाम किया. इस तरह मां तारा महादेव शिव शंकर की मां हो गईं । पौराणिक अख्यान के अनुसार देव गुरू व्टहस्पति की भार्या तारा तथा चंद्रमा के पुत्र बुध मगध के राजा थे । मगध के राजा बुध की भार्या तथा वैवस्वत मनु की पुत्री इला से पुरूरवा ,गय , उत्कल तथा विशाल हुए ।  कपीलवस्तु के राजा सुद्धो की पत्नि महामाया के पुत्र भगवान बुद्ध की आराध्या देवी माता तारा थी । केसपा मंदिर में मां तारा की पौराणिक मूर्ति आठ फीट से भी ऊंची है. इस मूर्ति के सामने खड़े होकर नवरात्र में जो हाथ जोड़ लेता है, माता उसके सारे दुख हर लेती हैं। मां तारा की मूर्ति पर किसी लिपि में बहुत कुछ लिखा हुआ है, पर इसे आजतक नहीं पढ़ा जा सका है. पुरातत्वविदों को इस मंदिर की दीवारें भी बहुत कुछ बता सकती हैं. यहां की दीवारें चार फीट से ज्यादा चौड़ी हैं ।कच्ची मिट्टी और गदहिया ईट से निर्मित मंदिर के गर्भ गृह की दीवार 4-5 फीट मोटी है. गर्भ गृह की सुन्दर नक्काशिया मंदिर में प्रवेश करने वाले श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है. गर्भ गृह में विराजमान मां तारा देवी की वरद हस्त मुद्रा में उतर विमुख 8 फीट उंची आदमकद प्रतिमा काले पत्थर की बनी है. मां तारा के दोनों ओर दो योगिनी खड़ी है. मंदिर के चारों ओर एक बड़ा चबूतरा है ।मां तारा देवी के मंदिर को देखने और सर्वे करने तीन विदेशी पुरातत्ववेत्ता केसपा आ चुके है ।सन 1812 में स्कॉटलैंड के मि. फ्रांसिस बुचनन- भूगोलिक, जीव विज्ञानी और वनस्पति-विज्ञानिक,मि. फ्रांसिस बुचनन केसपा और मां के मंदिर में 4 फरबरी 1812 आये थे. वह लिखते है की उस समय मंदिर मिटटी, ब्रिक्स और स्टोन की बनी हुई थी. मंदिर में बहुत से चित्र दिवार पर बनी हुई थी और मंदिर के दरवाज़े के पास बहुत सी चित्र नष्ट हो चुकी थी. मंदिर के दीवार पर प्लास्टर नहीं किया हुआ था. उस समय वहां पर तीन पुजारी पूजा कर रहे थे. मैंने जब उनलोगों से पूछा की मंदिर कब बना है तो उनमें से एक पुजारी गुस्सा हो कर कहा की यह मंदिर सतियुग में बना है. इसके बाद मैंने विवेक पूर्ण तरीके से मंदिर क देखा तो उनसे आगे पूछना बेकार समझा की मंदिर कब बना है.फ्रांसिस बुचनन बताते है की मंदिर के बीच में मानव आकृति में माँ तारा की प्रतिमा सर से लेकर पैर तक एक साड़ी में ढकी हुई खडी थी. मै यह समझा की भगवान वासुदेव स्त्री के कपड़े में सजे हुए है. मैंने इस बारें में पूछना उचित नहीं समझा. यह जगह बहुत बड़ा धार्मिक आस्था का जगह है । सन 1872 में अमेरिकन-भारतीय इंजिनियर, पुरातत्ववेत्ता, फोटोग्राफर मि. जोसेफ डेविड बेलगर, माँ के मंदिर आये.बेलगर के अनुसार यह मंदिर मध्यकालीन युग 9 वीं, 10 वीं शताब्दी में बना है, वह आगे लिखते है गांव के चारो तरफ मंदिर है जो की प्राचीनतम है भगवान बुद्ध की प्रतिमा भी गांव के बिच मे स्थित है. गाँव में बहुत से प्रतिमा जगह जगह दिखाई पड़े है । डेनमार्क के पुरातत्ववेत्ता, फोटोग्राफर मि. थिओडोर बलोच द्वारा 1992 ई. में केसपा तारा मंदिर को पुरातात्विक सर्वे के लिए आ चुके है. थिओडोर द्वारा मां तारा को आस्था और धार्मिक का केंद्र माना गया है । माँ  तारा द्वारा मगध के विदूषक देवन मिश्र को आशिर्वचन दिया गया था । टिकारी राज सात आना के दरबारी विदुषक देवन मिश्र को माँ तारा ने साक्षात् प्रकट होकर  आशिर्वचन दी  ।
पंडुई  -  अरवल जिले का करपी प्रखण्ड के केयाल राज के विध्वंश के बाद.बिहार के जहानाबाद  जिले का जहानाबाद से 5 किलो मीटर पच्छिम में दरघा नदी के पच्छिम तट पर स्थित  पंडुई 1710  ई.  में केयाल का राजा अदन सिह द्वारा  पंडुआ राज की स्थापित किया गया है । पंडुई राज के  मयुर भट्ट वंशज शासक थे ।  मगध के नोनारगढ़ और क्यालगढ़ के पश्चात् इनके पुर्वज राजकुमार श्री शितल मऊआर जी शीतलगढ़  बसाए और इसके पश्चात् पंडुई राज कि स्थापना करीब 1716-17 के आस मे हुई.क्यालगढ़ राज के मयूर भट्ट वंशीय सोनभद्री वत्स गोत्र राजा अदन सिंह (दल सिंह) ने औरंगजेब के पुत्र बहादुर शाह के विशाल सेना के साथ युद्ध किया और क्यालगढ़ राज हार गए. युद्ध में विजय के बाद मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ने क्यालगढ़ राज को नेस्तनामुद कर दिया.क्यालगढ़ के युद्ध को हार जाने के बाद राजा अदन सिंह ने अपने एकमात्र पुत्र राजकुमार शीतल मउआर के साथ अपनी सेना को ले कर अपने मित्र भोजपुर के राजपूत राजा सुधिष्ट सिंह के यहाँ चले गए.सन 1710 में राजा अदन सिंह क्यालगढ़ हार के बदला लेने के लिए वे अपनी सेना और अपनी मित्र के सेना की मदद से मुग़ल बादशाह बहादुर शाह के साथ भोजपुर में युद्ध किया. वहां की युद्ध में भी अदन सिंह युद्ध हार गए. राजा अदन सिंह अपने मित्र भोजपुर के राजपूत राजा सुधिस्ट सिंह के साथ उस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए. । राजा अदन सिंह के पुत्र राजकुंमार शीतल मउआर युद्ध में बच गये. वह वहां से लौट कर अपने ननिहाल शीतल गढ़ आये, वहां के राजा की कोई संतान नहीं थी, इसलिए शितलगढ़ में नाना के द्वारा वह उत्तराधिकारी बनाए गये.राजा शीतल मउआर महुआर शितलगढ़ के राजा बनने के करीब 3-4 साल बाद जब उनकी कोई संतान नही हुआ तब एक महात्मा ने बताया कि आप दरधा नदी के पश्चमी किनारे पर अपना राज स्थापित करें. वह पवित्र  भूमि है तब आपकी वंश वृद्धि अवश्य होगी.शितल मउआर के पुत्र का नाम जगरनाथ मऊआर था जिनके 2 पुत्र हुऐ - डंबर मउआर और वैजनाथ मउआर था. डंबर मउआर सन्यासी हो गये और वैजनाथ मउआर से वंश चला पंडुई राजवंश का. शीतल महुआर के पौत्र का नाम तेजा शाही था. महात्मा के कथन अनुसार राजा तेजा शाही जब दरघा नदी के पश्चमी किनारे पर गढ़ हेतु भूमि देखने गए तो उन्होंने वहा देखा की एक टीलेनुमा आकृति का एक भूभाग है जो तीन तरफ से जल से घिरा हुआ है और इसका आधा भाग ही पानी के बाहर हमेशा बाहर रहता है, इस पानी में कुछ जरूर है जिसके कारण यह डूबता कभी नही है और उस पर एक शिवलिंग भी अवस्थित था.उस समय यहाँ के स्थानीय लोग इस भूभाग को "पंडुबा" कहते थे. कुलपुरोहित ने भी इस स्थान को अत्यंत शुभ और पवित्र बताया. तब राजा तेजा सिंह को ये भूभाग बेहद पसन्द आया जो पंडुबा से कालांतर में पंडुई ग्राम हो गया.सन 1735 तक पंडुई ग्राम टिकारी राज के ज़मीनदारी में था और वहां उनके सामन्त पोखवा ग्राम के बाबु साहेब थे. 
चौधरी तेजा सिंह को कुलपुरोहित की आज्ञा के अनुसार अपना राज शितालगढ़ से पंडुई स्थापित करना था इसलिए राजा तेजा सिंह ने टिकारी राज पंडुई ग्राम मौजे की जमीनदारी खरीद ली थी जिसमे टिकारी के सामन्त पोख्वां के जमीनदार का भी हस्ताक्षर था और तब जा कर स्वतंत्र पंडुई राज की स्थापना हुई.अपने स्थापना के कुछ वर्ष के अंदर ही शितलगढ़ से 5 किलो मीटर दूरी पर पंडुई राज बन कर पूर्ण रूप से स्थापित हो गया था.पंडुई राज के बने भवन की स्थापत्य कला आज भी अपना पहचान बनाये रखा है. भवन की बनावट आज भी अद्वितीय है.पुराने शितलगढ़ किला जो वर्तमान में जमींदोज हो चूका है और अब मात्र टीले के रूप में देखा जा सकता है. कहा जाता है उस ज़माने में शितलगढ़ से "पंडुई राज" गढ़ के दरघा नदी के पास तक एक सुरंग बनी हुई थी.पंडुई ग्राम में सन 1716-17 में पंडुई राज के स्थापना के बाद आगे परम्परागत तौर पर सन 1865 तक निर्विरोद्ध काम काज चला.सन 1765 के बाद क्यालगढ़, अरवल का बहुत बड़ी ज़मीनदारी का भाग टिकारी राज के अंतर्गत आ गया था और टिकारी राज की ज़मीनदारी अरवल क्षेत्र में काफी फ़ैल चुकी थी.18वीं सदी तक पंडुई राज के 900 ग्राम/मौजा 16 आने मौजे में आते थे इसके बाद 19वीं सदी में यह घट कर और सिमट कर 320 ग्राम/मौजा में हो गया था.। ईस्ट इंडिया कंपनी के द्वारा पंडुई राज पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए गए और शासन के अधिकार को सिमित कर कर दिया गया था.  ।पंडुई राज मे राजवंश शासन सन 1865 मे अंतिम राजा श्री कन्हया शाही जी के मृत्यु के पश्चात समाप्त हो गया और पंडुई राज के शीतलगढ़ किले को विधर्मिओं द्वारा कानुन बना के तोड़ दिया गया और पंडुई मे किलेबंदी कानुन लागु हो गया. जिसके फलस्वरूप न तो कोई किले मे रह सकता है और न कोई किला बना सकता है क्युंकि अब पंडुई राज "राजा " दस्तावेज के अनुसार न होके मात्र जमींदार थे ।फिर सन 1857 के बाद अंग्रेजों के भारी प्रकोप के फलस्वरूप कई तरह के नियम बना कर पंडुई राज के किलों के साथ शितलगढ़ स्थित किला को ढाह दिया गया था और सन 1865 इसवी में पंडुई राज को किला, हथियार व सेना रखने के अधिकार से वंचित कर दिया गया था. ।शुरू से ही इसके पूर्व शासक ने नोनारगढ़, क्यालगढ़, शितलगढ़ में मुगल शासक से जबरदस्त संघर्ष किया फिर उसके बाद अंग्रेजों से पंडुई राज अंत तक संघर्ष करते ही रहा और अन्ततः पंडुई राज 75% जब नष्ट हो गया. ।तब अंग्रेजों के द्वारा पंडुई राज से राजा का पद्द्वि छीन ली गयी और पंडुई मात्र बबुअना या ज़मीनदार रह गया था.। जमींदार किले मे नहीं बल्कि हवेली मे रहते हैं. इसलिए आज से करीब पौने 200 वर्ष पहले पंडुई राज मे हवेलियों का दौर शुरू हुआ और समस्त पंडुई राज परिवार के लिये करीब 13 हवेलियां आगे पिछे, आस पास करके बनी जो कम जयदा अवस्था मे आज भी दृष्ट है. आज के संदर्भ मे जिनका विवरण इस प्रकार है -  पंडुई के शीतलगढ़ कि हवेली , विष्णुपुर पंडुई का किला या बडका कमरा ,  विष्णुपुर पंडुई का पुर्व भर कि हवेली , विष्णुपुर पंडुई का पश्चिम भर कि हवेली , विष्णुपुर पंडुई का गोदिल भवन हवेली ,  रामगढ़ पंडुई का थाना पर हवेली ,  रामगढ़ पंडुई का लाल कोठी हवेली , रामगढ़ पंडुई का पिली कोठी हवेली , रामगढ़ पंडुई का लमडोरिया दरवार पर हवेली , रामगढ़ पंडुई का कूटेश्वर भवन हवेली , सुल्तानी पंडुई का नयका हवेली , सुल्तानी पंडुई का दरवार पर हवेली, यही 12 हवेलियां पंडुई मे जीर्ण शीर्ण अवस्था में बची हुई हैं। सभी हवेली का क्षेत्रफल 9 बीघा से कम नहीं है. यह बिहार का हेरिटेज जगह है जहाँ 12 बड़ी-बड़ी हवेली एक ही गाँव में है. ।बाकि कुछ राज परिवार के सदस्य गण अपने अपने ज़मीनदारी मौजे मे ही बस गये और वहाँ पर भी उनकी हवेली है और कुछ सदस्य गण को अपने रिश्तेदार से मिले सम्पति (तड़का) के रूप में  ज़मीनदारी में बस गये ।इसके अलावे कुछ हवेलियां धार्मिक संस्था के नाम व कुछ ठाकुरबाड़ी के नाम भी कि गयीं हैं. किसी भी हवेली का क्षेत्रफल 9 बिघे से कम का नहीं है और ये भी परिवार के सदस्यों मे कई भाग मे बंट चुकि है. ।इस जगह पर इतनी हवेली देखने से यह लगता है, यह एक Heritage है, इसे सरंक्षित करना आवश्यक है.। लगभग 1910 के बाद पंडुई राज के परिवार के सदस्यों की संख्या काफी बड़ा हो गया था और पंडुई राज के परिवार के 4 दरवारों में बंट गया. बड़ा दरबार, मंझला दरबार, संझला दरबार और छोटा दरबार. ।1934 के सरकारी रिपोर्ट के अनुसार पंडुई राज के सिर्फ मंझला दरवार की आमदनी 1 लाख 10 हजार रूपया सलाना थी और वह दरबार सबसे सम्पन्न था.  । पंडुई राज में मंझला दरवार का हिस्सेदारी 4 आना था और बाकि 12 आने में पूरा पंडुई राज के अन्य सभी दरबार आते थे. ।सन 1910 के बाद के पंडुई राज परिवार के नफासत, तुजकाई, महिनी और अंदाजगी के भी बहुत किस्से मशहुर हुए हैं । जिसे सुन कर टिकारी राज के महाराजा गोपाल सरण सिंह भी अपने दांतों तले उँगलियाँ दबाते थे. ।पंडुई राज परिवार का सम्बन्ध बनारस राज परिवार के साथ भी रहा है. बनारस राज परिवार की कन्या की विवाह पंडुई के राज परिवार में हुआ था.  ।पंडुई राज में मंझला दरबार का बनी पिली कोठी और उसके द्वार आज भी देखने में अदभुत है, जो अब जीर्ण शीर्ण हो रहा है अब इसे सरंक्षण की जरुरत है. यह उच्च स्थापत्य कला का नमूना है.  ।टिकारी राज और पंडुई राज का दोनों में आपस का परस्पर और संयुक्त सम्बन्ध थे न की उनके अंतर्गत थे. पंडुई राज स्वयं स्वतंत्र था. । सन 1934 के सरकारी रिपोर्ट के अनुसार टिकारी राज जो पंडुई राज के मुकाबले में कई गुना सम्पन्न और बड़ा राज था और इसके राज परिवार के पास अंत तक राजा की पदवी रही. टिकारी राज पंडुई राज से पदवी, आमदनी, क्षेत्रफल और सम्पन्नता में काफी बड़ा था. । पंडुई राज की 1952 तक ही राज-पाठ और जमींनदारी रही. इसके चारों दरबार की भवन और विरासत स्वयं अपनी इतिहास बता रहा है.  ।सन 1765 में हुए सन्धि के अनुसार बिहार, बंगाल और उडीसा की दीवानी शासन अंग्रेजों की हाथ में आ गयी थी. इसका मुख्यालय कलकत्ता था.  । इसलिए इस क्षेत्र का बिहार, बंगाल और उडीसा में कोई भी राज स्वतंत्र तौर पर रियासत या देशी रियासत (प्रिसली स्टेट्स) के लिस्ट में नही आया था.। 1948 में बिहार में सभी स्टेट की जमीनदारी समाप्त हो गयी थी. भारत से राज तंत्र का अंत हो गया था और प्रजातंत्र का उदय हो चूका था ।
वीर सिंह  -  टिकारी राज का संस्थापक वीर सिंह उत्तर प्रदेश के कनौज जिले का द्रोण टिकार   निवासी थे । वीर सिंह द्वारा 1707 ई. में ‘टिकारी राज’ की स्थापना की गयी थी । चौधरी अजब सिंह के पुत्र वीर सिंह बचपन से बहुत ही कर्मठी थे । उनके परिवार के लोग बहुत तंगी हालत में अपना जीवन यापन कर रहे थे । वीर सिह को अपने परिवार की तंगी हालत देखी नहीं गयी और वे निराश हो कर अपनी मूल पैत्रिक स्थान छोड़कर रोज़ी-रोटी के तलाश में सर्व प्रथम मेजा शहर, उत्तर प्रदेश गए, कुछ दिनों के बाद वहां से गया जिला में आ गए.राजा वीर सिंह के तीन लड़के हुए – त्रिभुवन सिंह, सुंदर सिंह, छतर सिंह । सन 1707 ईसवीं में वे यहाँ आ कर सर्वप्रथम गया पाल पंडा के यहाँ ठहर कर अपने पूर्वजों के नाम का सत्रह दिन का पिंड तर्पण किया । इसी दौरान वीर सिंह को  गया का वातावरण बहुत पसंद आ गया और गयापाल पंडा के यहाँ वे कुछ दिन ठहर कर उन्होंने अपनी रोज़ी रोटी की तलाश शुरू कर दी। वीर सिंह मजबूत कद काठी, साहसी, बलशाली एवं असाधारण व्यक्ति थे, सबसे पहले वे गया में दिल्ली के मुगल बादशाह के जिला फौजदार के यहाँ सैनिक पद पर भरती हुए, फिर बाद में सन 1707-08 में स्थानीय उतरेन के नवाब के यहाँ सैनिक पद पर नियुक्त हो गये, उतरेन के नवाब के यहाँ काम करते हुए, धीरे धीरे तरक्की करते हुए वे उनके सेना के सेनापति बन गए.वीर सिंह की बहादुरी और वीरता की चर्चा मगध क्षेत्र में चारों तरफ होने लगी थी और उनकी वीरता की चर्चा राजा कंचन सिंह के बिहटा राज (पटना ) में पहुँच चुका था । वीर की  दूरदर्शिता, बहादुरी एवं वीरता के कारण ही उनकी शादी बिहटा राज ( पटना ) के ज़मीनदार राजा चौधरी कंचन सिंह के सुपुत्री के साथ हुई थी. राजा कंचन सिंह के यहाँ शादी करने के बाद उनकी प्रशिद्धि एवं ताकत काफी बढता जा रहा था. सन 1709 में उनका प्रथम पुत्र त्रिभुवन सिंह का जन्म हुआ, उस समय वे उतरेन के नवाब के यहाँ सेनापति पद पर कार्यरत थे. राजा कंचन सिंह अजीमाबाद के नायब सूबेदार सैय्यद हुसैन अली खान के बहुत करीबी थे. वीर सिंह की बहादुरी और वीरता का चर्चा अजीमाबाद (पटना) के सूबेदार सैयद हुसैन अली खान के पास पहुंचा, उस समय हिंदुस्तान में सैयद बंधू सैयद हुसैन अली खान एवं सैयद अब्दुल्लाह अली खान को किंग मेकर कहा जाता था. सैयद बंधू में किसी भी व्यक्ति को रंक से राजा और किसी को राजा से रैंक बनाने की क्षमता थी.वीर सिंह समय को पहचानते हुए अपने ससुर कंचन सिंह के द्वारा अपनी पहुँच अजीमाबाद के सूबेदार हुसैन अली खान तक बना लिए थे. राजा कंचन सिंह की नायब सूबेदार सैयद हुसैन अली खान से बहुत गहरी दोस्ती थी. अब राजा कंचन सिंह नायब सूबेदार, अजीमाबाद के बन चुके थे ।अजीमाबाद के नायब सूबेदार सैयद हुसैन अली खान ने वीर सिंह के असाधारण प्रतिभा को देखते हुए, उन्हें लाव के आस पास के गाँव के देखभाल के लिए अपना सिपहसालार नियुक्त कर दिया । यही से वीर सिंह के किस्मत ने पलटी मारी. अब नायब सूबेदार सैयद हुसैन अली खान के छत्रछाया में आगे बढ़ते रहे। दिल्ली के मुग़ल बादशाह के दरबार में सूबेदार हुसैन बन्धुओ का पकड़ सन 1708 ई. से 1722 ई. तक बना हुआ था । राजा कंचन सिंह अजीमाबाद के सूबेदार सैयद हुसैन अली खान के दाहिने हाथ थे । इसलिये  बिहटा (पटना) के राजा कंचन चौधरी का दिल्ली के मुग़ल बादशाह के राज दरबार में भी पहुँच बन चूका था।  1702 ई. में मुगल सम्राट औरंगजेब के पौत्र राजकुमार अज़ीम-उस-शान को बिहार का सूबेदार नियुक्त किया गया था. अजीम के पटना आगमन पर यहाँ की किला बंदी मजबूत करायी गयी और पटना को दिल्ली के तरह सजाया गया । प्रशासनिक सुधार करते हुए उन्होंने विशेष रूप से पटना में किया, फलतः पटना का नाम अपने नाम के अनुसार बदलकर ‘अजीमाबाद’ रख दिया । उसने नगर के सौंदर्यीकरण में उस समय १ करोड़ रूपया खर्च किये । दिल्ली के मुग़ल बादशाह बहादुर शाह के मृत्यु के पश्चात अगला शासक बनने के होड़ में आपसी पारिवारिक लड़ाई में सन 1712 इसवी में अज़ीम-उस-शान की हत्या हो गई. इस कालखंड के आस-पास भारत में दिल्ली के मुग़ल साम्राज्य का पतन, औरंगज़ेब के शासन काल (1658-1707) में था । राज दरबार की हालत इतनी बदत्तर हो गयी थी कि सैनिकों को वर्षों तक का वेतन नहीं मिल पा रहा था, जिससे मुग़ल सेना के सैनिकों में असंतोष दिन पर दिन बढ़ता जा रहा था. मुग़ल सैनिक राज्य के नागरिकों को डरा धमका कर लूट खसोट कर ही अपना गुज़ारा करते थे.वे सभी आपस में लड़ते और उलझते रहते थे. आए दिन आपस में एक-दूसरे से छोटी झडपें होती रहती थी.मुग़ल साम्राज्य के बादशाह को अपने सूबेदार और जागीरदार पर से पकड़ दिन पर दिन कमजोर होता जा रहा था । बहादुर शाह के शासन काल में बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा में मुर्शिद कुली ख़ाँ, अवध में सआदत ख़ाँ तथा दक्कन में निजामुलमुल्क ने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर लीं. इसके अतिरिक्त इसके काल में गंगा तथा दोआब क्षेत्र में रोहिला सरदारों ने भी अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली थी. उसके राज काल में मुग़ल सम्राट कठपुतली से ज्यादा कुछ नहीं रह गए थे. दिल्ली सल्तनत का केंद्र शक्तिहीन हो चूका था और दिल्ली साम्राज्य के अलग अलग प्रान्तों में छोटी छोटी सामंती शक्तियां सर उठा रही थी ।  नए-नए लोग अपनी सेना को गठन करके जागीर, गढ़ या परगना के गाँव पर हमला कर रोज़ नए-नए स्वतंत्र प्रदेश बनाते जा रहे थे। इसी घटना क्रम के फायदा उठा कर वीर सिंह ने पाली के नवाब के यहाँ कमांडर पद की नौकरी छोड़ दी थी और अजीमाबाद के सूबेदार हुसैन अली खान और नायब सूबेदार राजा कंचन सिंह के परोक्ष समर्थन पा कर, वीर सिंह ने अपने घर लाव में अपनी एक निजी सेना का गठन कर लिया था। अब वे एक सैनिक प्रमुख के रूप में एक शक्ति का केंद्र स्थापित कर लिए थे. इसी समय मराठा लड़ाका रघुजी भोसंले ने मगध पर चढ़ाई कर दिया था, वीर सिंह ने डटकर मराठा सैनिकों से मुकाबला किया और मराठा लड़ाकों को युद्ध में हरा कर मगध से खदेड़ दिया था. मराठा लड़ाकों ने इनके समय मगध पर तीन बार हमला किया था.अब वीर सिंह का नाम मराठा से युद्ध करने के बाद काफी प्रसिद्ध हो गया और बहुत दूर दूर तक के लोग उन्हें बहुत बड़ा वीर और असाधारण योधा के रूप में जानने लगे. पाली के नवाब के यहाँ दुश्मनों ने हमला बोल दिया था, वहां से दुश्मनों को खदेरेने में वीर सिंह के सेना का भी बहुत बड़ा हाथ था. वीर सिंह का कद दिन पर दिन काफी बढ़ता जा रहा था. वीरसिंह अब काफी धनवान और ताकतवर हो चुके थे. अब तक ये एक पुत्र त्रिभुवन सिंह के पिता भी बन चुके थे । वीर सिंह ने अजीमाबाद के सूबेदार और कंचन सिंह के समर्थन पा कर अपनी सेना को ले कर पहला हमला लाव गढ़ के नवाब के गढ़ पर किया, नवाब को पराजित करते हुए उनके लाव के गढ़ पर कब्ज़ा कर लिया, अब वह लाव गढ़ के ज़मीनदार बन गए और लाव गढ़ के कोठी को वे अपना निवास स्थान बना लिया. यहाँ रहते हुए वीर सिंह का दूसरा पुत्र सुंदर सिंह का जन्म 1711 में और तीसरा पुत्र छतर सिंह का जन्म 1713 में हुआ था. वीर सिंह ने लाव के दक्षिणी भाग में स्थित लाव गढ़ को और मजबूत रूप से निर्माण करवाया. इस गढ़ को आज के समय लोग इसे सुंदर सिंह गढ़ कहते है. वीर सिंह का ताकत दिन पर दिन लगातार काफी बढ़ता जा रहा था, उन्होंने लाव गढ़ के के कई ग्रामों पर हमला करते हुए उसे अपने कब्ज़े में ले लिया था. उन्हें सबसे बड़ी कामयाबी सन 1718 में हुई जब वे सोनौत परगना के फौजदार मकसूद खान के गढ़ पर चढ़ाई कर दिया और फौजदार को मार कर सौनोत गढ़ को अपने कब्ज़े में कर लिया था. अब वह पुरे सनौत परगना के मालिक हो गए और मकसूदपुर के सैन्य छावनी किला के साथ साथ उसमें रह रहे सैन्य बल भी अपने कब्जे ले लिया था. वे यहाँ इस सैन्य छावनी किला को सबसे पहले अपना राज का मुख्यालय बनाया.इसके बाद वीर सिंह ने सोनौत परगना के अगल बगल के परगनाओं के कई गाँव पर हमला कर के अपने कब्ज़े में ले लिया था. इसी तरह वीर सिंह ने अपने होने वाले संभावित दुश्मनों को भी पराजित कर उनके जागीर को अपने राज में मिला लिया था. अब तक वीर सिंह मगध के शक्ति के केंद्र बन चुके थे । सोनौत परगना जितने के बाद सन 1719 इसवी में दिल्ली के मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह ने अपने राज दरबार में वीर सिंह को बुला कर, उनके वीरता एवं साहस पर खुश हो कर उन्हें राजगी, खिल्लत और सनद सम्मान दिया और उन्हें राजा का पदवी भी प्रदान की.राजा के पदवी मिलने के बाद सन 1720 इसवी में वीर सिंह अपने राज की राजधानी एवं किला का निर्माण शुरू करने के लिए अपने राज पुरोहित श्री श्री 108 विद्या चरण भारती के साथ जगह की तलाश में निकल पड़े, मोरहर नदी से 1 कि . मी पश्चिम जंगल में एक बहुत बड़ा प्राचीन गढ़ रूपी टिल्हे पर उन्होंने देखा की एक बगुला जो एक बाज़ को मार रहा है, उसे देखकर उनके राज पुरोहित जी को इस जगह में कुछ खासियत दिखाई पड़ा. उन्हें यह प्राचीन टिल्हे पर राजा वीर सिंह के किला बनाने के लिए पसंद आया. राज पुरोहित के सलाह के अनुसार राजा वीर सिंह उस जगह पर अपने किला का निर्माण शुरू करवा दिया । जहाँ पर उन्होंने किला का निर्माण शुरू करवाया, उस जगह का नाम उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिला के टिकार नामक जगह के निवासी होने के कारण टिकारी रख दिया और बाद में वीर सिंह ने अपने किला का नामकरण भी टिकारी राज कर दिया । टिकारी राज और टिकारी शहर के निर्माणकर्ता थे ।राजा वीर सिंह के शासन काल के दौरान बिहार में अँगरेज़ के ईस्ट इंडिया कंपनी पटना में आयी, यहाँ आकर उन्होंने पटना में फैक्टरियां डाली. सन 1713 इसवी में फर्रूखशियर के शासन काल में फैक्टरियां बंद करा दी गई. फर्रूखशियर ने पुनः सन 1717 ईसवीं में अंग्रेजों को बिहार और बंगाल में व्यापार करने की स्वतंत्रता प्रदान कर दी. अतः सन 1718 ईसवीं में अंग्रेजों ने पटना में अपनी फैक्टारियां को पुनः चालु कर दी. बिहार में जमींदारों के खिलाफ अनेक सैनिक दमनकारी अभियान चलाए गये. भोजपुर के उज्जैन जमींदार सुदिष्ट नारायण का विद्रोह, धर्मपुर के जमींदार हरिसिंह का विद्रोह आदि प्रमुख विद्रोही थे. इन विद्रोहियों का तत्कालीन गवर्नर सूर बुलन्द खाँ ने दमन किया. सूर बुलन्द खाँ के पश्चात् खान जमान खाँ 1718-21 ई. में बिहार का सूबेदार बना. अगले पाँच वर्षों के लिए नूसरत खाँ को बिहार का नया गवर्नर बना दिया गया. बाद में फखरुद्दौला बिहार का सूबेदार बनकर उसने छोटा नागपुर, पलामू, जगदीशपुर के उदवन्त सिंह के खिलाफ सैन्य अभियान छेड़ा ।राजा वीर सिंह की मृत्यु सन 1729 इसवी में हुई. इनकी मृत्यु के बाद उतराधिकार के रूप में उनके सबसे बड़े लड़के त्रिभुवन सिंह टिकारी राज की सता हासिल किया । टिकारी राज (1885-1904) - टिकारी राज नौ आना के महाराज राम किशन सिंह की विवाह मुज्ज़फरपुर के प्रतापवंद के राजरूप कुंवर के साथ हुई थी. उन दोनों की कोई पुत्र नहीं था, उनकी संतान के रूप में दो लडकियां थी. वे लोग छोटी लड़की राधेश्वरी कुंवर @ किशोरी मईयां को बहुत चाहते थे । उनकी शादी मुजफ्फरपुर के चिकना स्टेट के बाबू अंबिका सरन सिंह @ बाबू साहब के साथ हुई थी, वे लोग अपनी बेटी राधेश्वरी कुंवर के विवाह के उपरांत बेटी और दामाद को अपने साथ रखा करते थे ।महाराजा राम कृषण सिंह की मृत्यु नवम्बर 1875 और महारानी राजरूप कुंवर की मृत्यु 01.10.1884 को हो गई थी ।सन 1884 में अपनी माँ राजरूप कुंवर की मृत्यु के बाद राधेश्वरी कुंवर @ किशोरी मईयां टिकारी राज के कानूनी उत्तराधिकारी थी और उस समय टिकारी राज नौ आना के महारानी के पद पर बैठी. उनका एकमात्र पुत्र महाराजा गोपाल सरन सिंह थे. जो उस समय 1 वर्ष के बालक थे. । बाबू अंबिका सरन सिंह @ बाबू साहब कम पढ़े लिखे और मोटा बुधि वाले व्यक्ति थे. वे दिन भर मदिरा पान किये रहते थे. नशे के हालत में आये दिन राज में अप्रिय घटना कर देते थे ।महारानी अपने पति के व्यव्हार से बराबर क्षुब्द रहा करती थी. वे बराबर उन्हें समझाने के प्रयास करती थी , मगर बाबु साहेब ठहरे मोटा बुधि और अक्खड़ स्वाभाव के और उस पर से नशे में डूबे रहते थे. इस कारण महारानी का बात उनके स्वाभाव को नहीं बदल पाता था. अंबिका प्रसाद सिंह @ बाबू साहब पूरी तरह से अशिक्षित और अक्षम व्यक्ति थे, टिकारी राज नौ आना का राज प्रबंधन महारानी साहिबा की ओर से उनके दीवान प्रसिद्ध लेखक बाबू देवकी नंदन खत्री द्वारा किया जाता था.उस समय टिकारी राज सात आना की रानी रामेश्वरी कुंअर @ दुलहिन साहिबा थी जो रानी भुनेश्वरी कुएर की दादी थीं.। अंबिका प्रसाद सिंह @ बाबू बाबू साहब हमेशा महारानी साहिबा के राज प्रबंधन में दखल देते थे और अपना मन मानी कार्य करते रहते थे । 1884 के दिसंबर के महीने में एक समय जब बाबू साहब भारी शराब के नशे मूड में थे, वे रनिवास में आ कर अपनी पत्नी रानी किशोरी मईयां के साथ झगड़ा करने लगे और नशे के मूड में उन्होंने महारानी साहिबा के शारीर के ऊपर अपने छड़ी से चार-पांच  छड़ी मर दिया. जिससे महारानी बुरी तरह से जख्मी हो गयी.  । बाबु साहेब ने अपनी छड़ी से इतनी बुरी तरह से इधर-उधर मारा कि महारानी साहिबा के शरीर के पीछे की त्वचा बुरी तरह से जख्मी हो गयी. इस घटना ने उन्हें इतना निराश कर दिया, उन्होंने तत्काल एक पत्र लिखा. पत्र में वह अपने क्रूर पति बाबू साहब के हाथों अपनी दयनीय स्थिति बता रही थी। टिकारी के कोतवाल भेजा और इस अप्रिय घटना पर करवाई करने को कहा. । यह घटना राज परिवार से सम्बंधित था इसलिय टिकारी के कोतवाल के अधिकार के बाहर की बात थी. । टिकारी के कोतवाल ने तत्काल इस घटना की जानकारी गया के तत्कालीन कलेक्टर श्री जॉर्ज अब्राम गियर्सन को बताया ।घटना की सूचना पा कर गया के कलेक्टर टिकारी राज के अतिथिशाला में पहुंचे और उन्होंने महारानी के पास सूचना भेजे की वे उनसे मिलना चाहते है। जॉर्ज अब्राहम गियर्सन टिकारी राज नौ आना के किला परिसर में पहुँचे और महारानी से मुलाकात की. महारानी ने गया के कलेक्टर से बाबू साहब की क्रूर कार्रवाई की पूरी कहानी सुनाई. ।कलेक्टर महारानी साहिबा के शरीर पर काले निशान के को देखकर बहुत दुखी हुए, उन्होंने तत्काल बाबु साहेब को बुला कर उनसे इस घटना पर अपनी बात रखने को कहा.। बाबु साहेब की बात को सुनकर कलेक्टर संतुष्ट नहीं हुए, उन्होंने बाबु साहेब से पढाई के बारें जानकारी मांगी तो बाबु साहेब गुस्सा हो बताये वे काफी शिक्षित है.। कलेक्टर ने बाबु साहेब की साक्षरता का सत्यापन करने के लिए एक कॉपी और पेंसिल दिलवाया और बोला की आप इस अपना पूरा हस्ताक्षर कीजिये.। बाबू साहब शुद्ध अक्खड़ आदमी पहले थोड़े से नर्वस हो गए और किसी तरह से उन्होंने नोटबुक में उल्टा सीधा में अपना हस्ताक्षर डाल दिया.। कलेक्टर ने बाबू साहब से पूछा कि आपने किस भाषा में हस्ताक्षर किया है. बाबू साहब ने जवाब दिया कि यह फ़ारसी भाषा में है, जिसे उन्होंने पढ़ा है.। कलेक्टर ने तत्काल वहां पर मौजूद टिकारी कोतवाल से फारसी शब्द को पढने के लिए मौलवी को लाने के लिए टिकारी राज स्कूल भेजा। राज स्कूल के मुख्य मौलवी एक बार आए. कलेक्टर ने उनके सामने बाबु साहेब का हस्ताक्षर किया हुआ नोट बुक को पढने के लिए कहा मुख्य मौलवी ने टॉपसी-टर्वी लाइन को देखकर कहा, उन्होंने जवाब दिया कि वह इसे नहीं पढ़ सकते हैं।फिर कलेक्टर ने वहां पर मौजूद मजिस्ट्रेट को एक बार फिर से दूसरे मौलवी को लाने का आदेश दिया, दूसरा मौलवी भी आया और बाबू साहब के पूरे हस्ताक्षर को पढ़ने की कोशिश की, लेकिन वह इसे पढ़ने में पूरी तरह से विफल रहा और उसने डीएम से कहा कि यह टॉपी-टर्वी लाइन में लिखा है नोट बुक पर कुछ भी नहीं लिखा हुआ है। बाबु साहेब के व्यवहार से नाराज़ हो कर कलेक्टर ने बाबु साहेब को दो घंटा के अन्दर टिकारी राज नौ आना के परिसर को छोड़ने का आदेश दे दिया. बाबु साहेब को टिकारी राज के गया में स्थित पहसी में रहने के लिए व्यवस्था करवा और कहा की जब तक उनके लड़के गोपाल शरण सिंह बालिग नहीं होगे तब तक उन्हें टिकारी राज किला में रहना प्रतिबंधित रहेगा.। महारानी साहिबा आपने आप को राज चलाने में असमर्थ बताया और उनके आग्रह पर कलेक्टर ने राजकुमार गोपाल शरण सिंह के बालिग होने तक टिकारी राज नौ आना को कोर्ट अॉफ वार्ड्स के अंतर्गत लेने और प्रबंधन करने का आदेश दे दिया.। गया कलेक्टर जॉर्ज अब्राहम गियर्सन गया वापस आकर अपने कार्यालय में टिकारी राज को कोर्ट अॉफ वर्ड्स में लेने का आदेश और उसके प्रबंधक मि. एंगुस् ओ ' गिल्वे को नियुक्त कर दिया। दादर और काबर परगना को गया जिला में सबसे पुराना परगना माना जाता है ।दादर परगना – दादर गाँव वर्तमान में गोह प्रखंड में है. यह औरंगाबाद जिला से 36 किलोमीटर पूरब में है. इसके दक्षिण में रफीगंज प्रखंड, उत्तर में हसपुरा, पूरब में कोंच प्रखंड, पच्छिम में दाउद नगर प्रखंड है. इसके पास के गाँव दिहुरी, चापुक, सिहुली, पोगर, पौथु इत्यादि कई गाँव हैं । काबर परगना – काबर गाँव वर्तमान में कोंच प्रखंड में है. यह गया जिला से 31 किलोमीटर उत्तर-पच्छिम में है. इसके पच्छिम में गोह प्रखंड, दक्षिण में गुरारू प्रखंड, पूरब में टिकारी प्रखंड, पच्छिम में परैया प्रखंड है. इसके पास के गाँव मुड़ेरा, आंती, कोराप, खजुरी, पलुहर, अंगरा-दौरमा  इत्यादि कई गाँव है. । काबर एक छोटा और अच्छा परगना था,  इसके दक्षिण में पहारा परगना पड़ता था. पश्चिम में दादर परगना था, काबर परगना जो सौनौत परगना से सटा हुआ था । सन 1712 इसवी के आसपास टिकारी राज के प्रथम राजा वीर सिंह ने काबर परगना पर हमला कर उस पर विजय प्राप्त की थी. । राजा वीर सिंह का काबर में मुकाबला मुस्लिम सुबेदार से हुआ था. इसमें 5000 बाभनों को वीरगति मिली थी. जनेऊ के आधार पर गणना हुई थी. । महाराजा सुन्दर शाह ने अपने शासनकाल में काबर गढ़ में कुछ निर्माण कार्य करवाया था ।काबर परगना में महाराजा मित्रजित सिंह ने बहुत से मौजा/ गाँव की ज़मीनदारी को ख़रीदा भी था । काबर परगना में खेती के लिए ज़मीन का प्रतिशत ज्यादा था, जिससे राजस्व की प्राप्ति अधिक होती थी. पर यहाँ सिऔर दो फसली ज़मीन का प्रतिशत  काबर गढ़ में राजा बाबन सुब्बा का 52 बीघा में किला था. काबर गढ़ के बगल में बसा काबर गाँव में आज भी हिन्दू और मुस्लिम दोनों संप्रदाय आपस में मिलकर सौहाद्पूर्ण वातावरण में रहते है. काबर गाँव में विशाल दुलभ शिवलिंग और कई प्राचीन दरगाह आज भी मौजूद है. । सन 1857 में गया जिला 17 क्रांतिकारी पर मुकदमा अँगरेज़ ने चलवाया था और उनकी सम्पति जब्त की गयी थी. उनमें दादर परगना के क्रांतिकारी ठाकुर ओझा भी थे. । दादर और काबर परगना में सन 1794 इसवी के आसपास जागीरदार नवाब मुज़फ्फर जंग रहा करते थे, यह दोनों परगना नवाब मुज़फ्फर जंग का जागीर था.। सन 1794 में दोनों परगना में बंगाल डिस्ट्रिक्ट गजेटियर के अनुसार काबर परगना में 1,01, 699 बीघा ज़मीन था, जिसमें 95,405 बीघा ज़मीन पर कर लगता था. इसमें से 6,995 बीघा free hold जमीन था. 95,405  बीघा का लगान जमा 45,744 रूपया था. । दादर परगना में 39,111 बीघा ज़मीन था जिसमें 38,082 बीघा ज़मीन पर कर लगता था. इसमें से 1029 बीघा free hold जमीन था,  38,082 बिधा का लगान जमा 14,086 रूपया था ।दादर परगना के कुछ ज़मीनदारी को टिकारी राज के महाराजा ने खरीद कर अपने राज के लिए अधिग्रहित किया था. । सन 1918 के सर्वेक्षण रिपोर्ट में गया के जिलाधिकारी  इ. एल. टनर लिखते है की सन 1918 में दादर और काबर परगना दोनों परगना का राजस्व निम्न रूप से था । काबर परगना का राजस्व 45,745 रूपया वार्षिक था। दादर परगना का राजस्व 14,385 रूपया वार्षिक था । दोनों परगना में उस समय मुख्यतः छोटे छोटे ज़मीनदार के हाथ में ज़मीनदारी थी । सन 1918 में टिकारी राज नौ आना की, काबर परगना की 20 गाँव में ज़मीनदारी थी ।काबर मुग़ल बादशाह अकबर के शासन काल के समय का परगना है ।आइन-ए-अकबरी में दादर और काबर परगना के बारें में लिखा गया है. उस समय परगना के शासक को सरकार भी कहा जाता था. काबर परगना का क्षेत्रफल दादर परगना से बडं था ।आइन-ए-अकबरी अर्थ:अकबर के संस्थान, एक 16वीं शताब्दी का ब्यौरेवार ग्रन्थ है. इसकी रचना अकबर के ही एक नवरतन दरबारी अबुल फज़ल ने की थी. इसमें अकबर के दरबार, उसके प्रशासन के बारे में चर्चा की गई है. इसके तीन ख्ण्ड हैं, जिनमें अंतिम खंड अकबरनामा के नाम से है. ये खंड स्वयं तीन प्रखंडों में है ।अबुल फज़ल के आइन-ए-अकबरी में  दादर परगना ,काबर परगना की चर्चा है।टिकारी राज का महाराजा मित्रजीत सिंह के पुत्र हितनारायण सिंह तथा मोदनारायण सिंह तथा खॉन बहादुर खॉ थे । टिकारी राज के  सात आना के प्रथम राजा मोद नारायण सिंह तथा अल्ला जिल्लाई उर्फ वासंती वेगम का पुत्र खानबहादुर खॉ को टिकारी राज का एक आना भाग प्रप्त हुआ था । टिकारी राज के राजा मित्रजीत सिंह की पुत्री राजेश्वरी कुंवर ,शिवरतन कुंवर तथा राजकुमारी थी । टिकारी के राजा मित्रजित सिंह के पुत्र हित नारायण सिंह और मोद नारायण सिंह अकुशल और अविवेकी , अव्यवहारिक , बोलचाल और रहन सहन आपस में मेल नहीं खाता था जिससे आये दिन राज परिवार में कलह होते रहता था । मोद नारायण सिंह योग्यता और राज प्रबंधन में अपने बड़े भाई हित नारायण सिंह से ज्यादा कुशल और व्यावहारिक थे । वे महाराजा मित्रजित सिंह के प्रतिनिधि के रूप में ज्यादा कुशलता  से कार्य करते थे । टिकारी राजा मित्रजीत सिंह  द्वारा मोद नारायण सिंह को टिकारी राज का राजा बनाया गया था । टिकारी राजा मित्रजित सिंह ने २४ मई १८१९ को  बक्शीशनामा के द्वारा अपने छोटे पुत्र मोद नारायण सिंह को टिकारी राज की गद्दी सौपी दी थी । जेष्ट पुत्र हितनारायण सिंह उक्त बक्शीशनामा के खिलाफ पटना में प्रांतीय  कोर्ट में मुकदमा किया और उक्त वाद में अपने पिता और छोटे भाई को पक्षकार बनाया. १३ फरबरी १८२२ को पटना के प्रांतीय कहचरी ने बक्शीशनामा को निरस्त कर दिया था । पुत्रों  के व्यवहार से थक हार कर मित्रजित सिंह अपने राज का बटवारा सन १८४० को दोनों पुत्रों के बीच कर दिया ।बड़े पुत्र हितनारायण सिंह को बड़े होने के नाते ज्येठांश के रूप में १ आना ज्यादा भाग ९ / १६ भाग यानि नौ आना दिया और छोटे पुत्र मोद नारायण सिंह को ७/१६, सात  आना दिया गया । टिकारी राज के बटवारा में टिकारी राज नौ आना को टिकारी, दक्षिण बिहार के पहाड़ी भाग, औरंगाबाद स्टेट में ज़मीन और गया शहर में काफी ज़मीन दिया गया था. इस राज की ज्यादतर ज़मीन पथरीला और बंजर थी, जबकि टिकारी राज सात आना को उतर बिहार के मैदानी एवं उपजाऊ ज़मीन, गया के शहर में ज़मीन, टिकारी किला के चारों ओर उपजाऊ और अन्य जगह का ज़मीन मिला था । जिससे टिकारी राज सात आना का राजस्व टिकारी राज नौ आना से ज्यादा आता था । ०१.०१.१८४० को मोद नारायण सिंह टिकारी राज से अलग कर बने नए टिकारी राज सात आना के गद्दी पर बैठे । सन १८४५ में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से उन्हें महाराजा की उपाधि और खिल्लत प्रदान की गयी। टिकारी राजा मित्रजित सिंह के छोटे लड़के मोद  नारायण सिंह का जन्म १८०४  इसवी में हुआ था । मोदनारायण सिंह युवा अवस्था में काफी शोख, चंचल और हिम्मती थे । इनके बारें में कहा जाता है की इनके साथ ८-१० युवा दोस्तों का दल था. सभी लोगों के पास अच्छे नस्ल के घोड़े थे. ये अपने दोस्तों के साथ रात में करीब १०-१२ के बीच निकल कर अपने राज से १००-१०० किलो मीटर दूर जा कर अपने दुश्मनों से मारपीट जैसे अप्रिय वारदात करके लौट जाते थे ।उनके खिलाफ शिकायत कलेक्टर के पास आने लगा अंत में उनके व्यवहार से काफी परेशान हो कर गया जिला के प्रभारी कलेक्टर थॉमस लॉ टिकारी राज आये और उनके बारें में काफी छानबीन किये लेकिन उनके खिलाफ कोई साबुत नहीं मिला । अंत में थक हार कर कलेक्टर ने उनको रात में निगरानी रखने के लिए टिकारी राज के चारो तरफ पहरा बैठा दिया था । उस दिन भी रात में उन्होंने अपने दोस्तों के साथ निकल कर अप्रिय घटना के अंजाम देते हुए अहले सुबह आकर अपने बिस्तर पर सो गए थे. उधर घटना की जानकारी मिलते ही कलेक्टर का आदमी सुबह में उनके पास आया तब उनको विस्तर पर गहरी नींद में सोते हुए पाया था और उन पर लगा आरोप गलत पाया गया । मोद नारायण सिंह को बटवारा में टिकारी राज से सटे उत्तर में बड़े मैदान से आच्छादित छोटा सा किला परिसर मिला था. वह अपने किला परिसर को दुर्ग नुमा बनाना चाहते थे । मोदनारायण सिंह को  पाश्चात्य संस्कृति से बहुत लगाव था, वे एक बार विदेश घुमने के लिए लंदन गए हुए थे, वहां बने हुए मकान इनको बहुत भा गया था, वह वहां से लौट कर टिकारी राज में उसी तरह के रूप अपने किला परिसर को विस्तार करने का फैसला किया. इसके लिए अपने सात आना सफील से सटे रकवा से मिटटी काट कर, सफील पर मिटटी भरवा कर लैण्ड स्कैपिंग करके, उसके ऊपर बहु मंजिला ईमारत बनाने कार्य शुरू किया था. इसी बीच उनकी मृत्यु हो गयी और उसके बाद यह कार्य अधुरा रह गया । गया के कलेक्टर एलंजो मॉनी लिखते है की मोदनारायण सिंह द्वारा शेरघाटी में विद्रोहियों को कुचने के करवाई किया जा रहा था । १० जुलाई १९५७ को पटना प्रमंडल के आयुक्त विलियम टेलर का महत्वपूर्ण पत्र उनके पास आया । मि. टेलर के अनुसार टिकारी राज सात आना के राजा मोद नारायण सिंह ने किले के चारों ओर करीब २०० तोपों लगा रखी है ।आप तुरंत वहां एक गुप्तचर को भेजिए और गुप्तचर आ कर पुष्टि करें तो आप सिख और अँगरेज़ सेना को लेकर रातों रात प्रस्थान करों और टिकारी राज किला पर आक्रमण कर दो । एलंजो मनी ने तुरंत एक जासूस को पता लगाने के लिए टिकारी राज भेजा, जासूस के आने के खबर मिलते ही राजा ने सभी तोपों को वापस बुला लिया था. गुप्तचर गया आकर इस सूचना को गलत बताया.। गया में पकडे गए विद्रोहियों के अस्त्र-शस्त्र टिकारी राज के शस्त्रागार में रखे हुए हथियारों से मेल खाता था. अंत में अंग्रेज अधिकारियों ने टिकारी राज सात आना और नौ आना के सभी  हथियार और किले में रखे गए २०० तोपों को जब्त कर लिया.। पटना के प्रमंडल आयुक्त विलयम टेलर ने उस समय कलकत्ता में तत्कालीन ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रांतीय लेफ्टिनेंट गवर्नर फेडेरेक हालीडे को टिकारी राज के विद्रोही क्रिया कलाप पर विस्तृत रूप से पत्र लिखा था. पत्र के अंत में विलियम टेलर ने फेडरेक हालिडे से टिकारी किला को तोप से उडा कर नेस्तनाबूद कर देने का आदेश माँगा. लेकिन लेफ्टिनेंट गवर्नर हालीडे ने टेलर को इसकी इज़ाज़त नहीं दी.विलियम टेलर के इस कार्य में पटना प्रमंडल में तैनात प्रभारी मजिस्ट्रेट जे एम लेविस का भी सहयोग प्राप्त था.। पटना प्रमंडल के आयुक्त विलियम टेलर बहुत ही क्रूर था, उसमें आतंक और हिंसा का भावना था, उनमें ठोस विचार, साहस और वीरता जैसे गुणों से सुसज्जित थे. हर बागी की सजा उसके विचार से मौत हुआ करती थी. उसने पटना में कई विद्रोहियों को फांसी पर लटका दिया था ।  कई का घर ज़मिन्दरोज कर दिया था. उसके व्यवहार से लेफ्टिनेंट गवर्नर फेडरेक हालिडे बहुत ही खफा रहते थे । प्रांतीय लेफ्टिनेंट गवर्नर हालिडे फेडरेक सरकारी कार्यो से सम्बंधित कोई स्वंतत्र राय नहीं रखते थे. दोस्तों और मित्रों की राय प्रायः उनकी रहनुमाई किया करती थी. वे शांतिप्रिय थे और दूसरों के बात पर बहुत ध्यान देते थे ।गया के कलेक्टर एलान्जो मनी का स्वाभाव में दिखावा, रंग बदलना और उतावलापन था. उनका दिमाग शीघ्र विचार करने में और उस पर कारवाई करने में असमर्थ था और उनके निर्णय शक्ति प्रायः डगमगाती रहती थी.। उपरोक्त अफसरों में राय में भिन्नता और आपस में एक दुसरे की सामंजस्यता नहीं रहने के कारण टिकारी राज बर्बाद होने से बच गया। टिकारी राज का तोप का कारखाना ---उस समय टिकारी राज अंतर्गत दाऊद नगर में टिकारी राज के लिए पीतल के तोप ढाली जाती थी. वहां तोप बनाने की बहुत बड़ा कारखाना था. इसके लिए टिकारी राज ने उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर से बहुत से कारीगरों को दाऊद नगर  बुलवाया था । ०१.०१.१८४० को मोद नारायण सिंह टिकारी राज का सात आना के गद्दी पर बैठे । ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से उन्हें महाराजा की उपाधि और खिल्लत प्रदान की गयी ।अपने राज में विद्यालय की स्थापना---महाराजा मोद नारायण सिंह ने अपने शासन काल में शिक्षा के प्रसार के लिए टिकारी और शेरघाटी में विद्यालय की स्थापना की थी । मोद नारायण सिंह की पहला विवाह उनकी बारह वर्ष की आयु में, सन १८१६ में बनारस के महाराजा महीप सिंह की पुत्री अश्वमेघ कुंवर के साथ हुई थी । इनकी दूसरी शादी सुनीत कुंवर के साथ हुई थी । रानी सुनीत कुंवर की मृत्यु सन १८७३ इसवी में हो गयी थी. इनकी दोनों रानियाँ से कोई बाल- बच्चे नहीं हुए थे.। 
 बेलखरा महाल  -  बिहार के अरवल जिले का करपी प्रखण्डान्तर्गत बेलखरा स्टेट का गठन ११० गॉवों को मिला कर १८५१ ई. में किया गया था । टिकारी महाराजा मोद नारायण सिंह ने तीसरी शादी मुस्लिम महिला बैराती बेगम से हुई है । बैराती बेगम से दो पुत्र और दो पुत्रियाँ हुई थी । बैराती बेगम के परवरिश के लिए महाराजा मोद नारायण सिंह ने सन १८५१ में बेलखरा महाल से ८९ गाँव और दाखनेर महाल से २१ गांवों को काट कर ११० गॉवों को मिला कर बेलखरा स्टेट १८५१ ई. में बैराती बेगम को  दिया था । टिकारी राजा मोद नारायण सिंह की मृत्यु १० सितम्बर १८५७ को हो गयी थी । इनकी मृत्यु के बाद टिकारी राज नौ आना के महाराजा हितनारायण सिंह ने सात आना को अपने राज में मिला लिया था. जिसे गया के जिला कलेक्टर एलंजो मॉनी उसे अवैध करार दे दिया और टिकारी राज सात आना को पुनः अलग कर दिया। राजा मोद नारायण सिंह की मृत्यु के बाद इनकी दोनों पत्नियाँ अश्वमेघ कुंवर और सुनीत कुंवर टिकारी राज सात आना के मालकिन हो गयी. । रानी अश्वमेघ कुंवर को अपने पति से सात आना की आधी और रानी सुनीत कुंवर से आधी ज़मींदारी दो अलग अलग अधिकार पत्र ३१ अगस्त १८७२ और ५ अप्रैल १८७३ को मिली थी. इसके बाद रानी अश्वमेघ कुंवर टिकारी राज सात आना की पूर्ण मालकिन हो गयी । रानी द्वारा गोद लेना --रानी अश्वमेघ कुंवर ने टिकारी राज परिवार के उतरावां गढ़ के कुंवर चैन सिंह के परपौत्र और बिशुन सिंह तथा विश्राम सिंह के बेटे कुंवर रण बहादुर सिंह को सन १८७३ में गोद ले ली थी। रण बहादुर सिंह को सन १८८८ में राजा और खिल्लत की उपाधि मिली । रानी की मृत्यु बड़ी रानी अश्मेघ कुंवर उर्फ़ बौधी रानी की मृत्यु १९ अक्टूबर १८७६ इसवी में हो गयी थी और छोटी रानी सुनीत कुंवर की मृत्यु ३० नवम्बर १८७२ ई. को हो गया ।मगध प्रमंडल के गया जिले का शेरघाटी अनुमंडल मुख्यालय शेरघाटी परगाना का प्रोपर्टी गुलाम हुसैन खान के अधीन था । गुलाम हुसैन खॉ के निधन के बाद टिकारी के राजा मित्रजीत सिंह के अधीन शेरघाटी परगाना 1791 ई. में थॉम्स लॉ के वोर्ड के निर्णय के आलोक के तहत आया था । औरंगाबाद जिले का सिरिस 1763 ई. तथा कुटुंबा परगाना 1763 ई. में नारायण सिंह का आधिपत्य था ।1801 ई. में कुटुंबा परगाना का शेयर के रूप में माली तथा पवई  को परगाना की स्थापना हुई थी । परगाना चर्कावां की स्थापना 1792 ई. में हुई थी । चरकावां परगाना को हवेली चरकावां , डुगुल , देव तथा उमगा परगाना के रूप में विभक्त हुअा था । उमगा तथा देव परगाना का मालिकाना राजपूत जमीनदार राजा छत्रपति सिंह तथा उनके पुत्र फतेह नारायण सिंह दवारा व्रिटिश शासन की सहायता स चरकावां परगाना के  चैत सिंह से प्राप्त की वही हवेली चरकावां और डुगुल परगाना पैठान फैमली के अधीन हुआ था ।1819 ई. में चरकावां ईस्टेट का मालिकाना देव राजा के अधीन था। परगाना मनौरा का का चौधरी दल सिंह और ऑछा तथा ,गोह परगाना का मालिकाना तेज सिंह थे । दादर तथा कावर परगाना की स्थापना 1819  ई. मे हुआ था । दादर और कावर परगाना का जागीर नवावमोजफ्फर जंग के अधीन था । कावर परगाना की चर्चा आईने अकबरी मे की गयी है ।अरवल जिले का अरवल परगाना की स्थापना 1819  ई. में की गयी है । नवादा जिले का नरहट और सामै ( सांबे ) परगाना में रेह ,पचरूखी ,जर्राह ,महेर था जिस पर टिकारी ,बुद्धौली महंथ बोधगया, बंगाली ईस्टेट और मकसुदपुर राज ईस्टेटका अधीन था । 1819 ई. में नरहट तथा सामै का विकासशील परगाना था । गया जिले का सुनौत परगाना के अंतर्गत अतरी , परहॉ ,दखनेर तथा जहानाबाद जिले का भेलावर ,ओकरी और ईक्किल परगाना 1819 ई. शामिल था । टिकारी ईस्टेट तथा मकसूदपुर ईस्टेटके अधीन था ।टिकारी राज के राजा मित्रजित सिंह के निधन के बाद उनके पुत्र हितनारायण सिंह को 9 आने तथा मोदनारायण सिंह 7 आने का मालिकाना हक मिला था ।







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