रविवार, जून 20, 2021

भगवान वेंकटेश्वर : मानवीय चेतना का द्योतक...

मानवीय सांस्कृतिक विरासत और सनातन धर्म की वैष्णव सम्प्रदाय का उद्गम स्थल तिरुपति वेंकटेश्वर मन्दिर तिरुपत स्थल है। तिरुपति भारत के सबसे प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में स्थित है। प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में दर्शनार्थी यहां आते हैं। समुद्र तल से 3200 फीट ऊंचाई पर स्थित तिरुमला की पहाड़ियों पर बना श्री वैंकटेश्‍वर मंदिर यहां का सबसे बड़ा आकर्षण है।  शताब्दी पूर्व वेंकटेश्वर मंदिर दक्षिण भारतीय वास्तुकला और शिल्प कला हैं। आंध्रप्रदेश के चितुर जिला का तिरुपति की सप्तगिरि की 2799 फीट उचाई श्रृंखला पर द्रविड़ शैली में निर्मित तिरुपति वेंकटेश्वर मंदिर  में भगवान विष्णु के रूप वेंकटेश्वर विष्णु स्थापित है । भगवान वेंकटेश्वर की उपासना का पर्व ब्रह्मोत्सव ,वैकुंठ एकादशी और रथ सप्तमी प्रसिद्ध है । संगम साहित्य में तिरुपति को त्रिवेंगदम कहा गया है। 5वीं शताब्दी तक यह एक प्रमुख धार्मिक केंद्र के रूप में  चोल, होयसल और विजयनगर के राजाओं द्वारा  तिरुपति भगवान वेंकटेश मंदिर के निर्माण किया गया था । भगवान  वेंकटेश्वर या बालाजी को भगवान विष्णु अवतार  है। भगवान  विष्णु ने सप्तगिरिकी सातवीं  वेंकटाद्रि पर्वत पर  स्थित तिरुमला स्थित  पुष्करणी सरोवर के किनारे निवास किया था। यह सरोवर तिरुमाला के पास स्थित है। तिरुमाला के चारों ओर स्थित पहाड़ियाँ, शेषनाग के सात फनों के आधार पर बनीं 'सप्तगिर‍ि' हैं। 11वीं शताब्दी में संत रामानुज ने तिरुपति  सातवीं पहाड़ी पर भगवान  श्रीनिवास की उपासना से पसंद होकर भगवान श्रीनिवास समक्ष प्रकट होकर आशीर्वाद दिया। श्रीनिवास प्रभु का आशीर्वाद प्राप्त करने के पश्चात रामानुज 120 वर्ष की आयु तक  वेंकटेश्वर भगवान की ख्याति फैलाई थी । 9वीं शताब्दी में काँच‍ीपुरम के शासक वंश पल्लवों ने इस स्थान पर अपना आधिपत्य स्थापित किया था, परंतु 15 सदी के विजयनगर वंश के शासन के पश्चात भी इस मंदिर की ख्याति सीमित रही। 15 सदी के पश्चात इस मंदिर की ख्याति दूर-दूर तक फैलनी शुरू हो गई। 1843 से 1933 ई. तक अंग्रेजों के शासन के अंतर्गत इस मंदिर का प्रबंधन हातीरामजी मठ के महंत ने संभाला। हैदराबाद के मठ का भी दान रहा है । 1933 में इस मंदिर का प्रबंधन मद्रास सरकार ने अपने हाथ में ले लिया और एक स्वतंत्र प्रबंधन समिति 'तिरुमाला-तिरुपति' के हाथ में इस मंदिर का प्रबंधन सौंप दिया। आंध्रप्रदेश के राज्य बनने के पश्चात इस समिति का पुनर्गठन हुआ और एक प्रशासनिक अधिकारी को आंध्रप्रदेश सरकार के प्रतिनिधि नियुक्त किया गया है।भगवान श्री वेंकटेश्वर मंदिर आंध्रप्रदेश के चितुर जिला का समुद्र तल से 3200 फीट की ऊँचाई पर तिरुमला पर्वत समूह के  वेंकटाद्रि पर्वत की सातवीं शृंखला  पर श्री स्वामी पुष्करणी नामक सरोवर के किनारे स्थित है। वेंकटेश्वर मंदिर  के गर्भगृह में भगवान वैंकटेश्चर विराजमान तथा मंदिर परिसर में पडी कवली महाद्वार संपंग प्रदक्षिणम, कृष्ण देवर्या मंडपम, रंग मंडपम तिरुमला राय मंडपम, आईना महल, ध्वजस्तंभ मंडपम, नदिमी पडी कविली, विमान प्रदक्षिणम, श्री वरदराजस्वामी श्राइन पोटु मंदिर हैं। मुख्यद्वार के दाएं बालरूप में बालाजी को ठोड़ी से रक्त आया था, उसी समय से बालाजी के ठोड़ी पर चंदन लगाने की प्रथा शुरू हुई। भगवान बालाजी के सिर पर रेशमी केश हैं, और उनमें गुत्थिया नहीं आती और वह हमेशा ताजा रहेते है। भगवान बालाजी गर्भगृह के मध्य भाग में खड़े है । बालाजी को प्रतिदिन नीचे धोती और उपर साड़ी से सजाया जाता है। गर्भगृह में चढ़ाई गई  वस्तु को  जलकुंड में  विसर्जन किया जाता है।बालाजी की पीठ को जितनी बार  साफ करे परंतु पीठ   गीलापन रहता  है, वहां पर कान लगाने पर समुद्र घोष सुनाई देता है।बालाजी के वक्षस्थल पर लक्ष्मीजी निवास करती हैं। प्रत्येक  गुरुवार को निजरूप दर्शन के समय भगवान बालाजी की चंदन से सजावट की जाती है उस चंदन को निकालने पर लक्ष्मीजी की छबि उस पर उतर आती है। बालाजी के जलकुंड में विसर्जित वस्तुए तिरूपति से 20 किलोमीटर दूर वेरपेडु से आती हैं। गर्भगृह मे जलने वाले अखंड ज्योति जलती रहती है । तिरुचनूर ( अलमेलुमंगपुरम ) तिरुपति से पांच किमी. दूरी पर श्री पद्मावती सरोवर और पद्मावती मंदिर  भगवान श्री वेंकटेश्वर विष्णु की पत्नी श्री पद्मावती लक्ष्मी जी को समर्पित है। गोपुरम तथा श्रीगोविंदराज मंदिर का निर्माण संत रामानुजाचार्य ने 1130 ई.  में की थी। गोविंदराजस्वामी मंदिर के  प्रांगण में संग्रहालय और पार्थसारथी, गोड़ादेवी आंदल और पुंडरिकावल्ली का मंदिर  है। मंदिर की मुख्य प्रतिमा शयनमूर्ति भगवान की निंद्रालीन अवस्था है। श्री कोदंडरामस्वमी मंदिर तिरुपति के मध्य में स्थित है। सीता, राम और लक्ष्मण मंदिर का निर्माण चोल राजा ने दसवीं शताब्दी में कराया था। मंदिर परिसर में अंजनेयस्वामी मंदिर श्री कोदादंरमस्वामी मंदिर है।कपिला थीर्थम भारत के आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में तिरुपति में स्थित शिव मंदिर और थीर्थम है। कपिला मुनि द्वारा स्थापित भगवान शिव को कपिलेश्वर जाता है। यह तिरुपति का एकमात्र शिव मंदिर है।कपिलानदी का उद्गम स्थल  सप्तगिरी  पहाड़ियों से  हैं। अलिपिरि तीर्थम में  श्री वेनुगोपाल ओर लक्ष्मी नारायण के साथ गौ माता कामधेनु कपिला गाय तथा हनुमानजी का अनुपम मंदिर स्थित हैं।श्री कल्याण वेंकटेश्वरस्वामी मंदिर तिरुपति से 12 किमी.पश्चिम में श्रीनिवास मंगापुरम में स्थित है। पुरणों के  अनुसार श्री पद्मावती से शादी के बाद तिरुमला जाने से पूर्व भगवान वेंकटेश्वर यहां ठहरे थे। मंगापुरम में स्थापित भगवान वेंकटेश्वर की पत्थर की विशाल प्रतिमा को रेशमी वस्त्रों, आभूषणों और फूलों से सजाया जाता  है। श्री कल्याण वेंकटेश्वरस्वामी मंदिर तिरुपति से 40 किमी दूर, नारायणवनम में भगवान श्री वेंकटेश्वर और राजा आकाश की पुत्री देवी पद्मावती यही परिणय सूत्र में बंधे थे। श्री देवी पद्मावती मंदिर, श्री आण्डाल मंदिर, भगवान रामचंद्र जी का मंदिर, श्री रंगानायकुल मंदिर और श्री सीता लक्ष्मण मंदिर , श्री पराशरेश्वर स्वामी मंदिर, श्री वीरभद्र स्वामी मंदिर, श्री शक्ति विनायक स्वामी मंदिर, श्री अगस्थिश्वर स्वामी मंदिर और अवनक्षम्मा मंदिर है । नगलपुरम में भगवान विष्णु ने मत्‍स्‍य अवतार लेकर सोमकुडु नामक राक्षस का  संहार किया था। श्रीवेद नारायण मंदिर के गर्भगृह में विष्णु की मत्स्य रूप में प्रतिमा के  दोनों ओर श्रीदेवी और भूदेवी विराजमान हैं। भगवान द्वारा धारण किया हुआ सुदर्शन चक्र सबसे अधिक आकर्षक लगता है। मंदिर का निर्माण विजयनगर के राजा श्री कृष्णदेव राय ने करवाया था। तिरुपति से 58 किमी. दूर, कारवेतीनगरम में श्री वेणुगोपाल स्वामी मंदिर स्थित है। यहां मुख्य रूप से भगवान वेणुगोपाल की प्रतिमा स्थापित है। उनके साथ उनकी पत्नियां श्री रुक्मणी अम्मवरु और श्री सत्सभामा अम्मवरु की भी प्रतिमा स्‍थापित हैं। यहां एक उपमंदिर भी है।श्री प्रसन्ना वैंकटेश्वरस्वामी मं श्री पद्मावती अम्मवरु से विवाह के पश्चात् श्री वैंक्टेश्वरस्वामी अम्मवरु ने  अप्पलायगुंटा पर श्री सिद्धेश्वर और  शिष्‍यों को आशीर्वाद दिया था। अंजनेयस्वामी मंदिर का निर्माण करवेतीनगर के राजाओं ने करवाया था।  आनुवांशिक रोगों से ग्रस्त रोगी वायुदेव  की उपासना करते है । प्रसन्ना वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर के परिसर में  देवी पद्मावती और श्री अंदल की मूर्तियां स्थापित  हैं। तल्लपका  श्री अन्नामचार्य का जन्मस्थान है। अन्नामचार्य श्री नारायणसूरी और लक्कामअंबा के पुत्र थे। श्री चेन्नाकेशव स्वामी  मंदिर का निर्माण  मत्ती राजाओं द्वारा किया गया था। श्री करिया मणिक्यस्वामी मंदिर नीलगिरी पर्वत पर  स्थित है। प्रभु महाविष्णु ने मकर को मार कर गजेंद्र नामक हाथी को बचाया था। महाभगवतम में गजेंद्रमोक्षम का उल्लेख है। कुशस्थली नदी के किनारे श्री अन्नपूर्णा काशी विशेश्वर स्वामी  मंदिर बग्गा अग्रहरम में स्थित है।  श्री काशी विश्वेश्वर, श्री अन्नपूर्णा अम्मवरु, श्री कामाक्षी अम्मवरु और श्री देवी भूदेवी समेत श्री प्रयाग माधव स्वामी की उपासना होती है।स्वामी पुष्करिणी जलकुंड के जल  का उपयोग  भगवान के स्नान के लिए, मंदिर को साफ करने के लिए, मंदिर में रहने वाले ब्राह्मणों द्वारा किया जाता है ।आदि। कुंड का जल पूरी तरह स्वच्छ और कीटाणुरहित है। वैकुंठ में विष्णु पुष्‍करिणी कुंड में  स्‍नान करते है । श्री गरुड़जी ने भगवान श्री वैंकटेश्वर के लिए  पुष्करिणी सरोवर का निर्माण किया था ।आकाशगंगा जलप्रपात के जल से भगवान को स्‍नान कराया जाता है। पहाड़ी से निकलता पानी तेजी से नीचे धाटी में गिरता है। तिरुमला के उत्तर में श्री वराहस्वामी मंदिर पुष्किरिणी के किनारे स्थित है। श्री वराह स्वामी मंदिर भगवान विष्णु के अवतार वराह स्वामी को समर्पित है।  तिरुमला आदि वराह क्षेत्र था और वराह स्वामी की अनुमति के बाद ही भगवान वैंकटेश्वर ने निवास स्थान बनाया। ब्रह्म पुराण तथा  अत्री संहिता के अनुसार वराह अवतार की   वराह, प्रलय वराह और यजना वराह की उपासना की जाती है। श्री बेदी अंजनेयस्वामी - स्वामी पुष्किरिणी के उत्तर पूर्व में स्थित श्री वेदी अंजने स्वामी  मंदिर हनुमान जी को समर्पित है। मंदिर परिसर के  अंतर्गत श्रद्धालु प्रभु को अपने केश समर्पित करते हैं जिससे अभिप्राय है कि वे केशों के साथ अपना दंभ व घमंड छोड़ देते है ओर मानव योनी मे जन्म ओर सम्सत पिढी की तरफ से कृतज्ञता हेतु केश समर्पिण किया जाता हैं । संस्कार घरों में नाई के द्वारा संपन्न किया जाता था, पर समय के साथ-साथ  संस्कार का ममन्दिर के पास स्थित 'कल्याण कट्टा'  स्थान पर सामूहिक रूप से संपन्न किया जाने लगा है ।  नाई कल्याण न कट्टापर  बैठते हैं। केशदान के पश्चात यहीं पर स्नान करते हैं. 
                                       

                                                तिरुवनंतपुरम का भगवाान वेंकटेश्वर


पुष्करिणी में स्नान के पश्चात मंदिर में दर्शन करने के लिए जाते हैं। तिरुमला पर्वत  समूह के  शेषाचलम , वेंकटाचलम पर्वत  की चोटी  पर तिरुपति मंदिर में स्थित  भगवान वेंकटेश को विष्णु का अवतार माना जाता है। भगवान विष्णु को वेंकटेश्वर, श्रीनिवास , गोविंदा और बालाजी नाम से उपासना की जाती है। तिरुपति के इस बालाजी मंदिर में श्रद्धा और आस्था के साथ अपने सिर के बालों को कटवाते हैं। वेंकटेश्वर मंदिर का निर्माण 300 ई.पू.तथा 18वी शादी में मराठा जनरल राघव जी भोसले द्वारा बल जी  मंदिर निर्माण कराया गया था । वराह पुराण में वेंकटाचलम या तिरुमाला को आदि वराह क्षेत्र , वायु पुराण में तिरुपति क्षेत्र को भगवान विष्णु का वैकुंठ , स्कंदपुराण में  तिरुपति बालाजी का ध्यान स्थल कहा है । पुराणों के अनुसार  वेंकटम पर्वत  को वाहन गरुड़ द्वारा भूलोक में लाया गया भगवान विष्णु का क्रीड़ास्थल है। वेंकटम पर्वत को   शेषाचलम को शेषनाग के अवतार के है। तिरुमला के  सात पर्वत शेषनाग के फन माने जाते है। वराह पुराण के अनुसार तिरुमलाई में पवित्र पुष्करिणी नदी के तट पर भगवान विष्णु ने ही श्रीनिवास के रूप में अवतार लिया।  रात्रि में मंदिर के पट बंद होने पर  देवताओं के द्वारा भगवान वेंकटेश की पूजा होती है। भगवान रुद्र के 11 वें अवतार हनुमान जी को बाला जी की उपासना की जाती है । ब्रह्मांड पुराण तथा ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार मारुतिनंदन हनुमान जी की  बाल्या अवस्था पर इंद्र द्वारा तिरुमला पर्वत पर बज्र अस्त्र से प्रहार करने के कारण हनु पर चोटे आयी थी । वह स्थल बल जी के नाम से ख्याति मिला था ।

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