रविवार, जून 20, 2021

गंगा : भारत की भुक्ति और मोक्षदायिनी नदी ....

भारतीय सांस्कृतिक विरासत और पुरणों, उपनिषदों में माता गंगा की उल्लेखनीय वर्णन है । गंगा भुक्ति तथा मोक्ष दायनी है ।उत्तराखंड राज्य का शिवालिक पर्वत समूह की शृंखला गोमुख से प्रविहित होने वाली गंगा गंगोत्री होते हुए देव प्रयाग में भगरीथी गंगा और अलकनंदा नदी का संगम और रुद्रप्रयाग स्थित मंदाकनी एवं गंगा का संगम के बाद ऋषिकेश होते हुए हरिद्वार की भूमि पर प्रविहित हुई है ।  शिव की जटाओं से प्रविहित होने वाली मां गंगा द्वारा  राजा भागीरथ के पूर्वजों की तृप्ति की  थी । ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष दशमी को माँ गंगा का प्राकट्य गंगा दशहरा के दिन स्नान और दान करने से पापों का नाश होता है । गंगा दशहरा का पर्व  जेष्ट मास शुक्ल पक्ष दशमी तिथि  शनिवार विक्रम संवत 2078 दिनांक 20 जून 2021 के अवसर पर माँ गंगा के मंत्र - ॐ नमो भगवती हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे माँ पावय पावय स्वाहा "नमो भगवत्यै दशपापहरायै गंगायै नारायण्यै रेवत्यै। शिवायै अमृतायै विश्वरूपिण्यै नन्दिन्यै ते नमो नमः।। से उपासना करने कस महत्व है । पुरणों के अनुसार महाराज सगर ने अश्वमेघ  यज्ञ की सुरक्षा का भार अपने  पौत्र अंशुमान को दिया था । देवराज  इंद्र ने सगर के यज्ञीय अश्व का अपहरण कर लिया था । अश्वमेध यज्ञ के रक्षक अंशुमान ने सगर की साठ हजार प्रजा लेकर अश्व को  भूमंडल खोज लिया पर अश्व नहीं मिला था । अंशुमान एवं सैनिकों द्वारा  अश्व को पाताल लोक में खोजने के लिए पृथ्वी के उत्खनन करने के बाद 'महर्षि कपिल' के रूप में तपस्या स्थल पर महाराज सगर का अश्व भ्रमण करते हुए   देखकर 'चोर-चोर' चिल्लाने लगा था । राजा सगर के सैनिकों और प्रजाओं द्वारा किये जा रहे कौतूहल के कारण महर्षि कपिल की समाधि टूटने पर  अपने आग्नेय नेत्र खोलने से  सगर की सारी प्रजा भस्म हो गई थी ।  मृत लोगों के उद्धार के लिए  महाराज दिलीप के पुत्र भगीरथ ने कठोर तप किया था । भगीरथ के तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उनसे वर मांगने को कहा टैब  भगीरथ ने 'गंगा' की मांग की थी । ब्रह्मा ने कहा- 'राजन भगीरथ !  गंगा के वेग को संभालने की शक्ति केवल भगवान शंकर में है ।  उचित होगा कि गंगा का भार एवं वेग संभालने के लिए भगवान शिव का अनुग्रह प्राप्त करना आवश्यकहै ।भगीरथ की  कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने गंगा की धारा को अपने कमंडल से छोड़ने के पश्चात भगवान शिव ने गंगा की धारा को अपनी जटाओं में समेटकर जटाएं बांध लेने के बाद   गंगा को जटाओं से बाहर निकलने का पथ नहीं मिल सका था । राजा भगीरथ द्वारा भगवान शिव की आराधना में घोर तप से प्रसन्न होकर  भगवान शिव ने गंगा की धारा को मुक्त करने का वरदान दिया था । भगवान  शिवजी की जटाओं से  कर गंगाजी प्रवाहित होकर  हिमालय की घाटियों में गोमुख , गंगोत्री , देवप्रयाग , ऋषिकेश और हरिद्वार की भूस्थल पर  कल-कल निनाद करके मैदान की ओर मुड़ी थी ।राजा भगीरथ द्वारा मां गंगा को उत्तराखंड , उत्तरप्रदेश , झारखंड , बिहार तथा बंगाल के क्षेत्रों में स्थित सगर एवं भगीरथ के पूर्वजों को उद्धार किया गया है । राजा भगीरथ द्वारा पृथ्वी पर गंगा अवतरण कर अपने पूर्वजों ,  जनमानस को  पुण्य से उपकृत कर दिया गया है ।  जेष्ट शुक्ल दशमी को मां गंगा भूस्थल पर अवतरण होने से गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान , गंगा जल की उपासना से  प्राणी मात्र को जीवनदान , मुक्ति , भुक्ति और मनोकामनाएं पूर्ण कर  देती है । गंगा की उद्गम स्थल गोमुख से भागीरथी गंगा गंगोत्री से प्रवाहित होती हुई बंगाल की खाड़ी में में मिलती है । बंगाल की खाड़ी में गंगा  की  संगम स्थल को गंगा सागर तीर्थ स्थल कहा गया है । गंगा के किनारे स्थलों में उत्तराखंड का  हरिद्वार , उत्तरप्रदेश के विंध्याचल , काशी , बिहार का सुतनगंज , पटना और बंगाल का गंगासागर में सनातन धर्म की सांस्कृतिक है । 


















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