बुधवार, जून 09, 2021

हिंगलाज शक्तिपीठ : आध्यात्मिक और मनोकामना स्थल...

                               
                         


               सनातन धर्म के शाक्त सम्प्रदाय की संस्कृति और मार्कण्डेय पुराण, देवीभागवत तथा इतिहास में हिंगलाज माता की प्रमुखता से उल्लेख है । शाक्त सम्प्रदाय में शक्ति और देवी की प्रधानता है । शाक्त धर्मग्रंथों में माता सती के प्रत्येक अंगों , आभूषणों और वस्त्रों के पतन स्थल को शक्तिपीठ है । पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रान्त के हिंगलाज में हिंगोल नदी के तट पर स्थित हिंगलाज मन्दिर है। हिंगलाज को  हिंगलाज माता , हिंगुला माता तथा नानी माता  कहते है । हिंगलाज माता मंदिर, पाकिस्तान का बलूचिस्तान प्रान्त के लासबेला जिलान्तर्गत मकरान तटीय क्षेत्र में हिंगलाज शक्तिपीठ अवस्थित है । हिंगलाज माता का गुफा मंदिर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में लारी तहसील के दूरस्थ, पहाड़ी इलाके में एक संकीर्ण घाटी में स्थित है। कराची के उत्तर-पश्चिम में 250 किलोमीटर (160 मील), अरब सागर से 12 मील (19 किमी) अंतर्देशीय और सिंधु के मुंहाने के पश्चिम में 80 मील (130 किमी) में स्थित हिंगलाज मंदिर है। हिंगलाज मंदिर  हिंगोल नदी के पश्चिमी तट पर, मकरान रेगिस्तान के खेरथार पहाड़ियों की  शृंखला के गुफा  में स्थित  है।  हिंगलाज मंदिर  प्राकृतिक गुफा में  शिला  की वेदी बनी हुई है। देवी की  मानव निर्मित छवि नहीं है। प्राकृतिक शिला की हिंगलाज माता के प्रतिरूप के रूप में पूजा की जाती है। शिला सिंदूर ,हिंगुला रंग से माता हिंगलाज   है। हिंगलाज मंदिर के समीप गणेश जी , माता काली, गुरुगोरख नाथ दूनी, ब्रह्म कुध, तिर कुण्ड, गुरुनानक खाराओ, रामझरोखा बेठक, चोरसी पर्वत पर अनिल कुंड, चंद्र गोप, खारिवर और अघोर पूजास्थल हैं ।डोडिया राजपूत की कुलदेवी हिंगलाज माता पूजनीय है। चारणों तथा राजपुरोहित की कुलदेवी हिंगलाज थी, जिसका निवास स्थान पाकिस्तान के बलुचिस्थान प्रान्त में था। हिंगलाज देवी से सम्बन्धित छंद गीत  है। सातो द्वीपों में सब शक्तियां रात्रि में रास रचाती है और प्रात:काल सब शक्तियां भगवती हिंगलाज के गृह में आ जाती है । माता सती के वियोग मे क्षुब्ध भगवान शिव जब सती की पार्थिव देह को लेकर तीनों लोको का भ्रमण करने लगे तब  भगवान विष्णु ने सती के शरीर को 51 खंडों मे विभक्त कर दिया जहाँ जहाँ सती के अंग- प्रत्यंग गिरे स्थान शक्तिपीठ कहलाये । केश गिरने से महाकाली,नैन गिरने से नैना देवी, कुरूक्षेत्र मे गुल्फ गिरने से भद्रकाली,सहारनपुर के पास शिवालिक पर्वत पर शीश गिरने से शाकम्भरीआदि शक्तिपीठ बन गये थे । सती माता के शव को भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से काटे जाने के कारण खेरधार पर्वत पर  माता सती का ब्रह्मरंध्र (सिर) गिरा था। हिंगलाज माता  शक्तिशाली देवी  है ।  हिंगलाज उनका मुख्य मंदिर की तरह  मंदिरों के  भारतीय राज्य गुजरात और राजस्थान में उनके लिए समर्पित मंदिर बने हुए हैं ।मंदिर को विशेष रूप से संस्कृत में हिंदू शास्त्रों में हिंगुला, हिंगलाजा, हिंगलाजा और हिंगुलता के नाम से जाना जाता है। देवी को हिंगलाज माता (मां हिंगलाज), हिंगलाज देवी (देवी हिंगलाज), हिंगुला देवी (लाल देवी या हिंगुला की देवी और कोट्टारी , कोटवी के रूप में भी जाना जाता है। स्थानीय मुस्लिम भी हिंगलाज माता पर आस्था रखते हैं और मंदिर को सुरक्षा प्रदान करते हैं। उन्होंने मंदिर को "नानी का मंदिर" कहते है। देवी को बीबी नानी (सम्मानित मातृ दादी) कहा जाता है। बीबी नानी, नाना के समान हो सकती है । कुशान सिक्कों पर दिखाई देने वाले एक पूज्य देव थे और पश्चिम और मध्य एशिया में व्यापक रूप से उनकी पूजा की जाती थी। प्राचीन परंपरा का पालन करते हुए स्थानीय मुस्लिम जनजातियां, तीर्थयात्रा समूह में शामिल होती हैं और तीर्थयात्रा को "नानी की हज" कहते है ।
 चारण जाति में उत्पन्न हुई देवियों के अवतारों में सर्वप्रथम हिंगळाज की  है । सती  के रूप में चारण में हिंगळाज का अवतार हुआ था। गौरविया शाखा के चारण हरिदास के घर नगर थट्टा में भगवती हिंगळाज का अवतार हुआ था।   चारण समाज एवं उदासीन सम्प्रदाय के संन्यासियों मे नगर थट्टे के हिंगळाज मन्दिर की यात्रा मूल हिंगळाज की यात्रा कहा गया है।  चारणों में यह मान्यता खूब प्रचलित है कि चारण जाति में जितने शक्ति के अवतार हुए हैं वे सब हिंगळाज के पूर्ण या खण्ड अंश को लेकर अवतरित हुए हैं। बंगला भाषा में कालिका नन्द अवधूत कृत 'मरु तीर्थ हिंगळाज'  पुस्तक है । देवदत्त शास्त्री कृत 'आग्नेय तीर्थ हिंगळाज'  पुस्तक ,  अे. अे. ब्रोही एवं रामचन्द्र एस. वर्मा के  'हिंगलाज यात्रा'  पुस्तक में माता हिंगलाज का उल्लेख हैं। जैसलमेर में एक मन्दिर में हिंगळाज देवी की मूर्ति के नीचे 'सातां दीप री राय श्री हिंगळाज' शब्द अंकित हैं। सातां द्वीप फारस की खाड़ी में पहाड़नुमा एक छोटा-सा है। देवी हिंगळाज की अखण्ड ज्योति जलती रहती है तथा उसका टापू प्रतिबिम्ब शरण हिंगळाज की गुफा में प्रतिबिम्बित होता रहता है। यह शरण हिंगळाज का स्थान बलूचिस्तान के कलात प्रदेश के लसबेला क्षेत्र की सम्माकलर तहसील में हिंगोळ नदी के किनारे पर स्थित है।सिन्धु नदी के मुहाने से करीब 122 किलोमीटर पश्चिम तथा अरब सागर से 18 किलोमीटर उत्तर में जहाँ मरकान तथा लस अलग-अलग होते हैं वहाँ पहाड़ी की अंधेरी गुफा में हिंगळाज देवी का स्थान है। इस क्षेत्र में हिंगळाज के बावन स्थान है, जिसमें प्रमुख स्थान शरण हिंगळाज ही माना जाता है।शरण हिंगळाज का पहाड़ द्वितीया के चन्द्रमा के से आकार का है । दीवारनुमा पहाड़ है। बायीं तरफ शुंभ कोट तथा दायीं तरफ निशुंभ कोट है । मध्य में शरण हिंगळाज की गुफा व कुण्ड है । वहीं पर हिंगळाज देवी के प्राकृतिक महल बने हुए हैं। ये यक्षों के बनाए हुए 'माई के महल ' कहलाते हैं। पैंतीस चालीस हाथ ऊँची रंग-बिरंगी छत। रंग-रंगीले लटकते पत्थरों का प्राकृतिक दृश्य । रंग-बिरंगा आँगन, जिस पर भाँति-भाँति के प्राकृतिक चित्र अंकित हैं ।
 मुसलमानों में हिंगळाज देवी लाल चौले वाली माई व नानी के नाम  है।  मुसलमान नानी की हज करने तथा  बावन स्थानों की परिक्रमा करने आते हैं। लाल कपड़ा, इत्र व अगरबत्ती इत्यादि चढ़ाकर पूजा करते हिंगळाज का हिंगळू सिन्दूर से भी पूजन होता है । हिंगळाज देवी की पूजा जुमन खॉप के मुसलमान करते हैं। नगर थट्टे में भी पूजा जुमन खॉप के मुसलमान करते हैं। हिंगळाज देवी की पूजा करने का अधिकार जुमन खाँप की ब्रह्मचारिणी कन्या को मिला हुआ है।वह चांगळी माई कहलाती है।  बलोच के ब्रोही का चांगळी माई अपना हाथ नई कन्या के सिर पर रखकर नई चांगळी माई तय करती है तथा उसे हिंगळाज देवी की पूजा का अधिकार प्रदान करती है। साथ ही माई की ज्योति जलाने का आशीर्वाद देती है । परिवार का मुखिया कोटड़ी का पीर कहलाता है। हिंगळाज देवी की गुफा ही कोटड़ी  है।  चन्द्रकूप  से हिंगळाज यात्रा तक चन्द्रकूप पहाड़ों के बीच भस्म का मंदिरनुमा  पहाड़ है। नीचे गोलाई का घेरा तीन किलोमीटर का तथा ऊपर आते-आते यह घेरा सौ-डेढ़ सौ मीटर  है । घेरे में दलदली ज्वालामुखी। जो निरन्तर खौलता रहता है। भाप निकलती रहती है। इस घेरे में साक्षात् पानी से बने शिवलिंग के दर्शन होते हैं। काली ने जब सृष्टि का संहार किया तब भगवान  शिव ने चन्द्रकूप से पानी का फवारा फेंका के कारण  काली अग्निरूप तथा शिव जल रूप  है) वैसे पहाड़ बन गए। स्त्री हत्या, भ्रूण हत्या भयानक पापों की स्वीकारोक्ति सबके सामने जोर से बोलकर करते हैं। यदि जानबूझकर पाप छिपा लिया तो नारियल डालते ही दलदल में बुलबुले उठना बन्द हो जाता है तथा नारियल ऊपर ही पड़ा रह जाता है । ऐसे व्यक्ति को हिंगळाज यात्रा के लिए अपात्र मान लिया जाता है। जिस यात्री का नारियल दलदल में समाविष्ट हो जाता है उसे आगे की अनुमति का प्रतीक माना जाता । जिस यात्री का नारियल दलदल वापिस बाहर फेंक देता है वह यात्री बहुत सौभाग्यशाली माना जाता है। अगले पहाड़ पर अघोरकुण्ड आता है। पहाड़ के पास हिंगोळ नदी द्वारा दिए गए  चक्र से अघोर कुण्ड निर्मित  है। यहाँ से हिंगळाज देवी का स्थान पच्चीस किलोमीटर है। अषोरकुण्ड से हिंगळाज तक हिंगोला नदी तीन बार रास्ते में आती है। नदी में  पानी मीठा और कहीं खारा जल है ।
 हिंगळाज मंदिर के स्थान तक पहुँचने के लिए शुंभ-निशुंभ के दीवारनुमा पहाड़ वाले कोट तक पहुँचने के लिए पहले उत्तर की तरफ चलना पड़ता है फिर पश्चिम की तरफ चलना पड़ता है। फिर हिंगळाज की के आगे पहुँचकर रात्रि जागरण कर शरण कुण्ड में स्नान कर नये कपड़े धारण कर पूजा की सामग्री लेकर गुफा में जाना पड़ता है। गुफा के अन्दर हिंगळाज देवी का मुख्य स्थान है। जहाँ सिन्दुरावेष्टित लाल कपड़े गुफा से शृंगारित हिंगळाज देवी का प्रस्तर है। जिसके आगे अखण्ड ज्योति प्रज्वलित है।हिंगलाज माता की पूजा के बाद दान-पुण्य करके कोटड़ी के ब्राह्मण , पीर की आज्ञा से गर्भ योनि में से निकलना पड़ता है।हिंगळाज देवी के थाम  के नीचे बायीं तरफ की मोरी से एकदम नग्न अवस्था में दो-दो यात्रियों की जोड़ी से दायीं तरफ की मोरी से निकलना पड़ता है। घुटनों के बल गर्भ योनि से निकलते ही चांगळी माई पहनने के लिए कपड़ा व प्रसाद स्वरूप गुड़ व चन्दले की घुट्टी देती है। कोटड़ी का पीर ठूमरों की माला पहनाते हुए कहते हैं कि अद्भुत, अपूर्व व अनिवर्चनीय इस आत्मानुभव को आत्मा में धारण किए रखना। अलग मत करना। इसके बाद यात्री दुबारा जन्मा व निष्पाप मान लिया जाता है । साथ का जोड़ीदार धर्म का भाई कहलाता है। पुनर्जन्म के बाद यात्री कापड़िया कहलाता है । गर्भ से बाहर आने पर कोटड़ी के पीर गुफा के शिखर के   शिला पर भगवान राम के हाथ से अंकित सूर्य और चन्द्र है । हिंगलाज माता का दर्शन करने के पश्चात भगवान राम, ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हुए थे। इसके बाद त्रिकुण्ड शिव कुण्ड, ब्रह्म कुण्ड , क्षीर कुण्ड में स्नान होता है। शिव कुण्ड, तिला कुण्ड व क्षीर कुण्ड विष्णु कुण्ड भी कहलाता है।तिला कुण्ड में तिल मुट्ठी में लेकर नहाते हैं, बाहर निकलने पर काले तिल सफेद हो जाते हैं । इसके बाद चौरासी का रास्ता तय करना पड़ता है जिसे आकाशगंगा की यात्रा  कहते हैं। पहाड़ पर अल्लील ( हलील) कुण्ड स्नान होता है। छड़ीदार पत्थर का बना बिना छेद का मन का ठूमरा कहते हैं । अल्लील कुण्ड के अन्दर डाल देता है जिसे यात्री तले तक डुबकी लगाकर ढूँढ़कर निकाल लाता है। मंगल गिरि आश्रम खैरथल (अलवर) के महात्मा ध्यान गिरि जी एवं बीकानेर के एक गृहस्थ माहेस्वरी महाजन करनाणी जी है । पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दू एवं बलोच (ब्रोही) मुसलमान  हिंगळाज की तीर्थयात्रा करते हैं। सातां द्वीप में पशनी बन्दरगाह से नाव में सवार होकर जाना पड़ता है। कलात में काली का प्रसिद्ध स्थान है। लसबेला के मुखिया जाम साहब कहलाते हैं।चारण  में होने वाली देवियां हिंगलाज देवी का ही अंश मानी जाती है। आवड़ माता, करणी माता, आदि देवियां हिंगलाज माता का ही अंश और अवतार माना जाता है।आवड़ माता के पिता श्री मामड़ जी  संतान प्राप्ति के लिए मां हिंगलाज की 7 बार यात्रा करने के बाद  मा हिंगलाज ने उनको आशीर्वाद दिया कि वो खुद उनके घर में प्रकट होंगे ।करणी माता जी के पिता जी श्री मेहो जी ने  संतान प्राप्ति के लिए हिंगलाज यात्रा की उस से खुश होकर देवी ने अवतार हुई थी । राजस्थान, गुजरात, हिंगलाज माता मंदिर बाड़ी मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र एवं हरियाणा  प्रान्तों में हिंगळाज मन्दिर हैं।  हिंगळाज मन्दिर जैसलमेर के   लुद्रवा  स्थान पर है। बाड़मेर जिले के सिवाणा तहसील से 12 किलोमीटर दूर छप्पन की पहाड़ियों की कोयलिया नामक गुफा में अष्टभुजी सिंह वाहिनी भगवती हिंगळाज माता की मूर्ति स्थापित है । मूर्ति के चरणों में निर्मल जल का झरना है। थान माता हिंगळाज मंदिर गढ सिवाणा के राजा वीरसेन द्वारा निर्मित है। सीकर जिले की फतेहपुर कस्बे की बुद्ध गिरी जी की मढ़ी में  हिंगळाज मन्दिर है । चूरू जिले के ल्होसणा बड़ा  हिंगळाज देवी का मन्दिर व बड़ा ओरण है।चुरू जिले के  बीदासर कस्बे में भी नाथों के अखाड़े में हिंगळाज  मंदिर है । फालना के निकट मन्दिरनुमा पहाड़ी पर  हिंगळाज मन्दिर है ।अजमेर जिले में अराई से पूर्व पहाड़ी पर हिंगळाज का मन्दिर , अजमेर नगर में भी दाहीरसेन स्मारक में हिंगळाज मन्दिर , बीकानेर के पास कोलायत में भी प्राचीन हिंगळाज मन्दिर , हरियाणा की सीमा कोल्हापुर एवं यवत माल जिलों में पहाड पर गढ़ हिंगळाज के नाम से प्रसिद्ध मन्दिर है। हिंगळाज शक्तिपीठ की अनुकृति में निर्मित हिंगळाज गढ़ , राजस्थान की सीमा से लगे भानपुरा , मंदसौर मध्य प्रदेश  से गांधी सागर जाने वाल मार्ग पर नावली  गांव से आठ किलोमीटर दूर कच्चे रास्ते पर गहरी घाटियों के मध्य छोटी-सी पहाड़ी पर स्थित यह गढ हिंगळाज की आराधना स्थली  है। बिंध्य प्रदेश में -ग्यारहवीं शताब्दी में निर्मित महिषासूर मर्दिनी की प्रतिमा में देवी का नाम 'हिगुल देव्या'  है। राजस्थान ,  गुजरात, सिंध, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, हारयाणा, पंजाब एवं दिल्ली  में हिंगळाज देवी के  मन्दिर  है । चारणों के गाँवों में तो हर जगह हिंगळाज देवी का मन्दिर  है। हिंगलाज शक्तिपीठ मानवीय जीवन में शांति और शक्ति तथा ऐश्वर्य प्रदान करता है । माता हिंगलाज के दर्शन और उपासना से मानसिक, शारीरिक , आध्यात्मिक  विकास और मनोकामनाएं पूर्ण होती है ।

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