मंगलवार, जून 15, 2021

सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा...

                           

                              


                                वेदों, पुरणों , उपनिषदों और दर्शनशास्त्रों में भगवान  ब्रह्मा सृष्टि के सृजनकर्ता , विष्णु पालनकर्ता और महेश विलयकर्ता हैं।  पुराणों में  ब्रह्मा जी  को स्वयंभू  और  वेदों का निर्माता कहा जाता है। भगवती सरस्वती ब्रह्मा जी की पत्नी सावित्री , गायत्री , श्रद्धा ,  मेघा और सरस्वती तथा   पुत्रों में  सनक , सनंदन , सनत , कुमार , पुलस्ति ,चित्रगुप्त ,  दक्ष और , भृगु , नारद है ।  ब्रह्मा जी  रजोगुण तथा सृष्टि के रचयिता है ।ब्रह्मा जी का  मंत्र  -ॐ ब्रह्मणे नमः ।। , अस्त्र - देवेया धनुष , जीवनसाथी - सरस्वती , संतान , सनकादि ऋषि,नारद मुनि और दक्ष प्रजापति तथा  सवारी - हंस   है ।भारत का राजस्थान के अजमेर जिले में पुष्कर स्थित पुष्कर झील के किनारे ब्रह्मा मंदिर , बाड़मेर जिले का असोत्रा का ब्रह्मा मंदिर , कुंबाकोणम  में ब्रह्म मंदिर ,कुल्लुघाटी स्थित खोखन में ब्रह्मा मंदिर , आंध्रप्रदेश के गुंटूर जिए के चेबरेलु में चतुर्मुख ब्रह्मा मंदिर ,उत्तरप्रदेश के पुर ,बिहार का गया जिले में गया स्थित ब्रह्मयोनि पर्वत श्रृंखला पर ब्रह्मा मंदिर ,झारखंड के माँगसो में ब्रह्मा मंदिर और थाईलैण्ड ,  बैंकॉक का इरावन ब्रह्मा मंदिर तथा कर्नाटक के सोमनाथपुरा में १२ वीं शताब्दी के चेनाकेस्वा मंदिर में ब्रह्मा की मूर्ति ब्रह्मा मंदिर में स्थापित है । भारतीय दर्शनशास्त्रों में ब्रह्मा जी  निर्गुण, निराकार और सर्वव्यापी  चेतन शक्ति ,  परब्रह्म ,  परम् तत्व और  ब्राह्मण हैं।ब्रह्मा के पुत्र सनकादिक , ऋषिसनक , सनन्दन , पुलस्ति , नारद मुनि , दक्ष , श्री चित्रगुप्त है ।विष्णु और शिव के साथ  मैत्रायणी उपनिषद् के पांचवे पाठ ,  कुत्सायना स्तोत्र छंद 5- 1, 2 ,  सर्वेश्वरवादी कुत्सायना स्तोत्र के अनुसार आत्मा ब्रह्म और परम सत्य  प्राणियों में मौजूद है।   ब्रह्म की आत्मा में ब्रह्मा , विष्णु , रूद्र (शिव) , अग्नि, वरुण, वायु, इंद्र , ब्रह्मांड समाहित है । मैत्री उपनिषद के अनुसार ब्रह्माण्ड अंधकार (तमस) से उभर कर प्रथम आवेग (रजस) के रूप में उभरने के  बाद  पवित्रता और अच्छाई (सत्त्व) में  परिवर्तन हुआ है । मैत्री उपनिषद ५.२[20][22] भागवत पुराण में उल्लेख है कि ब्रह्मा  "कारणों के सागर" से उभर कर  क्षण ,  समय और ब्रह्माण्ड का प्रादुर्भाव है ।  भागवत पुराण के अनुसार ब्रह्मा जी ने प्रकृति और पुरुष: को जोड़ कर  प्राणियों की विविधता बनाई तथा माया के सृजन  करने के लिए कियाऔर  माया से  अच्छाई और बुराई, पदार्थ और आध्यात्म, आरंभ और अंत का सृजन किया है । ब्रह्मा का मानव समय की ब्रह्म समय के साथ तुलना महाकल्प , ब्रह्मा के एक दिन और एक रात के बराबर है। स्कन्द पुराण में पार्वती को "ब्रह्माण्ड की जननी" कहा है। ब्रह्मा, देवताओं और तीनों लोकों को बनाने का श्रेय  पार्वती को देता है। पार्वती  पार्वती ने सत्त्व, रजस और तपस को प्रकृति में जोड़ कर ब्रह्माण्ड की रचना की। पौराणिक और तांत्रिक साहित्य में  ब्रह्मा के रजस गुण वाले देव के वैदिक विचार में ब्रह्मा जी की  पत्नी सरस्वती में संतुलन, सामंजस्य, अच्‍छाई, पवित्रता, समग्रता, रचनात्मकता, सकारात्मकता, शांतिपूर्णता, नेकता गुण है। ब्रह्मा के रजस , उत्साह, सक्रियता,  कर्मप्रधानता, व्यक्तिवाद, प्रेरित, गतिशीलता गुण को अनुपूरण करती हैं ।ब्रह्मा जी के चार मुख चारों दिशाओं में द्रष्टा और वेदों का निर्माता  है । ब्रह्मा के छः पुत्र -सनकादिक ऋषियों में,सनक,सनन्दन,पुलस्ति,नारद  और दक्ष थे  । ब्रह्मा जी के 108 नामों में  1. ॐ ब्रह्मणे नमः , 2 . गायत्रीपतये , 3 . सावित्रीपतये , 4 . सरस्वतिपतये ।5 . प्रजापतये , 6 . हिरण्यगर्भाय , 7 . कमण्डलुधराय ,  8 . रक्तवर्णाय , 9 . ऊर्ध्वलोकपालाय , 10 . वरदाय 11 . वनमालिने , 12 . सुरश्रेष्ठाय , 13 . पितमहाय , 14 . वेदगर्भाय 15 .चतुर्मुखाय , 16 . सृष्टिकर्त्रे , 17 . बृहस्पतये , 18 . बालरूपिणे , 19 . सुरप्रियाय , 20 .चक्रदेवाय नमः , 21 .  भुवनाधिपाय नमः , 22 . पुण्डरीकाक्षाय , 23 . पीताक्षाय ।24 . विजयाय , 25 .पुरुषोत्तमाय , 26 . पद्महस्ताय , 27 .  तमोनुदे , 28 .जनानन्दाय , 29 .जनप्रियाय , 30 .ब्रह्मणे , 31 . मुनये , 32श्रीनिवासाय 33 . शुभङ्कराय , 34 . देवकर्त्रे , 35 .स्रष्ट्रे , 36. विष्णवे , 37. भार्गवाय , 38. गोनर्दाय ।39* पितामहाय , 40 .महादेवाय नमः , 41.  राघवाय नमः , 42 . विरिञ्चये , 43 .वाराहाय , 44 . शङ्कराय , 45 . सृकाहस्ताय , 46. पद्मनेत्राय , 47. कुशहस्ताय , 48 .गोविन्दाय , 49 . सुरेन्द्राय , 50 .पद्मतनवे , 51. मध्वक्षाय 52. कनकप्रभाय , 53. अन्नदात्रे , 54 . शम्भवे , 55 . पौलस्त्याय , 56 . हंसवाहनाय , 57. वसिष्ठाय , 58 .नारदाय ।59*श्रुतिदात्रे ।60 .यजुषां पतये नमः , 61मधुप्रियाय नमः 62 . नारायणाय , 63 .द्विजप्रियाय ।64 .ब्रह्मगर्भाय , 65. सुतप्रियाय ।66*महारूपाय , 67.सुरूपाय 68 .विश्वकर्मणे 69 .जनाध्यक्षाय , 70. देवाध्यक्षाय 71 .गङ्गाधर , 72. जलदाय 73 .त्रिपुरारये 74. त्रिलोचनाय , 75 .वधनाशनाय 76. शौरये ,77. चक्रधारकाय ।78. विरूपाक्षाय 79 .गौतमाय 80 .माल्यवते नमः , 81. द्विजेन्द्राय नमः 82. दिवानाथाय , 83 .पुरन्दराय 84 .हंसबाहवे 85. गरुडप्रियाय , 86 , महायक्षाय , 87 .सुयज्ञाय , 88. शुक्लवर्णाय ,89 . पद्मबोधकाय ,  90 . लिङ्गिने  , 91 . उमापतये ।92 विनायकाय , 93 .धनाधिपाय , 94 . वासुकये , 95 . युगाध्यक्षाय , 96 . स्त्रीराज्याय 97 . तक्षकाय ,  99. पापहर्त्रे , 100 . सुदर्शनाय नमः , 101 महावीराय ।102 . दुर्गनाशनाय , 103 , पद्मगृहाय , 104 . मृगलाञ्छनाय , 105 . वेदरूपिणे ।106 . अक्षमालाधराय ,  ।107 . ब्राह्मणप्रियाय , 108 . विधये नमः है ।
 पुष्कर में ब्रह्मा जी की पत्नी सावित्री रूठने के कारण माता सावित्री ने ब्रह्मा के मंदिर के समीप पर्वत श्रृंखला पर  उपासना स्थल का निर्माण की  है। माता सावित्री सौभाग्य की देवी है । ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना के लिए राजस्थान के पुष्कर में यज्ञ का आयोजन किया था। यज्ञ में ब्रह्मा जी को पत्नी सावित्री के संग बैठना आवश्यक था, परंतु  उनकी पत्नी सावित्री को पहुंचने में देरी हो रही थी। पूजा का शुभ मुहूर्त बीता जा रहा था। सभी देवी-देवता यज्ञ स्थल पर आ चुके परंतु माता  सावित्री समय से नहीं आ पाईं थी ।  शुभ मुहूर्त निकलने लगा, तब मजबूरन ब्रह्माजी ने नंदिनी गाय के मुख से गायत्री को प्रकट किया और उनसे विवाह कर अपना यज्ञ संपन्न कर लिया। यज्ञ की स्थल पर सावित्री पहुंचीं तब  ब्रह्मा जी के बगल में अपनी जगह किसी अन्य स्त्री को यज्ञ में बैठे देख अत्यंत क्रोधित होती हुई माता  सावित्री ने   ब्रह्मा जी को शाप दिया कि आप जिस संसार की रचना करने के लिए मुझे भुला बैठने के कारण संसार आपको नहीं पूजेगा। माता सावित्री का क्रोध ने भगवान विष्णु को पत्नी से विरह का शाप  दी वहीं देवर्षि नारद  को आजीवन कुंवारा रहने तथा सावित्री के कोप से बच अग्नि देव  नहीं पाए है । शाप के बाद देवी-देवताओं ने सावित्री जी को अपना शाप वापस लेने का आग्रह किया। लिया हुआ शाप वापस नहीं लिया जा सकता था, गुस्सा शांत होने पर उन्होंने ब्रह्मा जी से कहा कि पूरे संसार में केवल पुष्कर ऐसी जगह है जहां आपका मंदिर होगा। अगर किसी ने कहीं और आपका मंदिर बनाना चाहा तो उसका विनाश निश्चित है। इसी के चलते ब्रह्मा जी का एकमात्र मंदिर पुष्कर में हैं। अरण्व वंश के एक राजा को स्वप्न हुआ  कि पुष्कर सरोवर के किनारे मंदिर को मरम्मत आदि की आवश्यकता है। राजा ने ब्रह्मा मंदिर का पुनर्निर्माण कराया था ।ब्रह्मा  मंदिर के पीछे  पहाड़ी पर ब्रह्मा जी की पत्नी सावित्री का  मंदिर है।  क्रोध शांत होने के बाद सावित्री पुष्कर के पास मौजूद पहाड़ियों पर जाकर तपस्या में लीन हो गईं थी ।पुष्कर में ब्रह्मा जी पूजा करने के बाद माता  सावित्री की उपासना होती है। सावित्री को सौभाग्य की देवी माना जाता है।  यहां पूजा करने से सुहाग की लंबी उम्र होती है। महिलाएं यहां आकर प्रसाद के तौर पर मेहंदी, बिंदी और चूड़ियां चढ़ाती हैं और सावित्री से पति की लंबी उम्र मांगती हैं।यहीं रहकर सावित्री भक्तों का कल्याण करती हैं। वहां जाने के लिए श्रद्धालुओं को कई सैकड़ों सीढ़ियां पार करनी पड़ती है। मन्दिर के बगल में  स्थान को सुनिश्चित करते समय ब्रह्मा जी के हाथ से कमल का फूल पृथ्वी पर गिर पड़ा। इससे पानी की तीन बूदें पृथ्वी पर गिर गई, जिसमें से एक बूंद पुष्कर में गिरी थी। इसी बूंद से पुष्कर झील का निर्माण हुआ।पुष्कर झील अपनी पवित्रता और सुंदरता के लिए पूरे विश्व में जानी जाती है। श्रद्धालुओं के लिए पुष्कर बहुत महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है।  पुष्कर हिन्दू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण तीर्थो में से एक है। इसका बनारस या प्रयाग की तरह ही महत्व है। 4 थी  शताब्दी में आए चीनी यात्री फाह्यान ने उल्लेख किया  है। पुष्कर सरोवर  में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। ब्रह्माजी ने पुष्कर झील किनारे कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णमासी तक यज्ञ किया था, जिसकी स्मृति में अनादि काल से  कार्तिक मेला लगता आ रहा है। सनातन धर्म तथा ब्रह्म संप्रदाय में ब्रह्मा जी की पूजन का महत्व है । सनातन धर्मावलंबी शुभ कार्यो यथा यज्ञ , विवाह कार्य , हवन कार्यो में ब्रह्मा की आराधना और उपासना की जाती है।

         

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