शुक्रवार, जून 25, 2021

मुक्तिनाथ : भुक्ति और मुक्ति स्थल...

 


        विश्व संस्कृति तथा सनातन धर्म की सांस्कृतिक और सभ्यता का मानवोचित गुणों के लिये भुक्ति तथा मुक्ति स्थल मुक्तिनाथ है । वेदांगों और उपनिषदों में मातंगक्षेत्र , कोंकणी क्षेत्र , और शालिग्राम क्षेत्र को मुक्ति क्षेत्र का उल्लेख किया गया है ।नेपाल देश का मुक्तिनाथ सनातन धर्म के वैष्‍णव संप्रदाय का शालिग्राम भगवान का मुक्तिनाथ प्रसिद्ध है। नेपाल की ओर प्रवाहित होने वाली काली गण्‍डकी नदी में शालिग्राम पाया जाता है। जिस क्षेत्र में मुक्तिनाथ स्थित हैं ।  8.167 मी . ऊँचाई वाली धौला गिरि पर्वत  समूह की मुक्तिनाथ पर्वत श्रंखला पर नेपाल का मस्तङ्ग जिले के मुक्तिनाथ मंदिर सनातन धर्म की  वैष्णव सम्प्रदाय का मोक्ष , माया योग और मानवीय जीवन का मूल दर्शन स्थल है । मुक्तिनाथ का उल्लेख वेदान्त , ·योग , शाकाहार शाकम्भरी  ,  आयुर्वेद , वेदसंहिता · वेदांग , ब्राह्मणग्रन्थ , पुरणों , आरण्यक , उपनिषद् · श्रीमद्भगवद्गीता , रामायण  और  महाभारत में है । प्राचीन काल में गंडकी का उद्गम स्थल पर ऋषि मतंग का आश्रम रहने के कारण मतंगक्षेत्र था बाद में मुक्तिनाथ क्षेत्र के रूप में सुविख्यात हुआ है । मतंगक्षेत्र में माता मातंगी की निवास थी । मुक्तिनाथ भुक्ति और मुक्ति क्षेत्र है । 108 दिव्‍य देशों में वैष्‍णवों का पवित्र मुक्तिनाथ मंदिर है।
शालिग्राम शिला  के रूप में पूजे जाते हैं। शालिग्राम पत्थर  पत्‍थर का निर्माण प्रागैतिहासिक काल में पाए जाने वाले कीटों के जीवाश्‍म से हुआ  है । ग्रन्थों  के अनुसार शालिग्राम शिला में विष्‍णु का निवास है। पुराणों  अनुसार भगवान शिव द्वारा असुर संस्कृति के राजा  जालंधर  से युद्ध नहीं जीत प्राप्त कर  रहने के कारण भगवान विष्‍णु ने उनकी मदद की थी।  मुक्तिनाथ स्थल पर निवास करने वाली असुर जालंधर की पत्‍नी वृंदा अपने सतीत्‍व को बचाए रखती तब तक जालंधर को कोई पराजीत नहीं कर सकता था। भगवान विष्‍णु ने जालंधर का रूप धारण करके वृंदा के सतीत्‍व को नष्‍ट करने में सफल हो गए। जब वृंदा को अपनी सतीत्व भंग होने का अहसास हुआ तबतक काफी देर हो चुकी थी। अपनी सतीत्व भंग होने पर  वृंदा ने भगवान विष्‍णु को कीड़े-मकोड़े बनकर जीवन व्‍यतीत करने का शाप देने के कारण भगवान विष्णु शालिग्राम पत्‍थर में हो गए थे । भगवान विष्‍णु शालिग्राम पत्‍थर में निवास करते हैं। मुक्तिनाथ बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए  महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। मुक्तिनाथ स्थल से उत्‍तरी-पश्चिमी क्षेत्र के महान बौद्ध भिक्षु पद्मसंभव बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए तिब्‍बत गए थे।मुक्तिनाथ नेपाल की ओर से प्रवाहित होने वाली मुक्तिनाथ के समीप  काली गण्‍डकी नदी में पाया जाने वाला शालिग्राम  है।  मुक्तिनाथ को मुक्तिक्षेत्र' और मोक्ष स्थल  कहा  जाता हैं । के मस्तांग जिले की थोरांग-ला पहाड़ियों के मध्य में समुद्र तल से 12300 फीट उचाई पर  पगोड़ा शैली में निर्मित मुक्तिनाथ मंदिर  स्थित है । मुक्तिनाथ परिसर के दक्षिणी  में मेबर लखांग गोम्पा में ज्वाला माई मंदिर हैं । गोम्पा स्थल पर  ब्रह्माजी ने ब्रह्मेष्ठी यज्ञ किया था । अग्नि की ज्वाला के साथ जल की प्राकृतिक धारा को पंचतत्व’ का प्रतीक  है । शिलालेखों के अनुसार सन 1815 में नेपाल की महारानी सुवर्णप्रभा द्वारा  मुक्तिनाथ मंदिर का पुनर्निमाण करवाई गयी थी । पुराणों के अनुसार  पृथ्वी 7 भागों और 4 क्षेत्रों में बंटने के कारण 4 क्षेत्रों में मुक्तिक्षेत्र कि शालग्राम पर्वत और दामोदर कुंड के बीच ब्रह्माजी ने मुक्तिक्षेत्र में ब्रह्मेष्ठी यज्ञ  से भगवान शिव अग्नि ज्वाला के रूप में और नारायण जल रूप में उत्पन्न होने  से पापों का नाश करनेवाला मुक्तिक्षेत्र है ।नारद पुराण वर्णित है कि दैत्यराज जलंधर को वरदान प्राप्त था कि उसकी पत्नी वृंदा के पतिव्रता धर्म के कारण  देव, देवी, दैत्य अथवा मानव जलंधर का वध नहीं कर सकता था । जालंधर के निरंकुश होकर सब पर अत्याचार करने लगा था । जालंधर के अत्याचार को समाप्त करने के लिये  श्रीहरि ने लीला रचकर जलंधर के वेष में वृंदा के घर पति बनकर रहने लगे । वृंदा ने ज्यों ही श्रीहरि को स्पर्श करने पर  बृंदा का सतीत्व  पतिव्रता धर्म नष्ट होने पर  भगवान शिव ने जलंधर का वध कर दिया । वृंदा को जब सच्चाई पता चली तो उसने श्रीहरि को कीट होने का शाप देकर खुद पति के साथ सती हो गयी थी । वृंदा सती होने के  बाद में  पौधा की उत्पत्ति  हो गयी थी । शालीग्राम रूपी श्रीहरि ने पौधा को  तुलसी नामकारण और वृंदा के सतीत्व की रक्षा के लिए उससे विवाह खुद को शापमुक्त किया था ।  तुलसी से विवाह कर काफी समय तक शालीग्राम  रहे थे ।मुक्तिनाथ मंदिर के गंडकी नदी के किनारे शालीमार रूप में आज भी श्रीहरि यहां निवास करते हैं ।मुक्तिधाम के गण्डकी नदी और दामोदर कुंड का  संगम को काकवेणी  हैं ।  कोंकणी स्थल  पर श्राद्ध एवं तर्पण करने से  21 पीढ़ियों को मुक्ति मिल जाती है. श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार  धुंधकारी की कोंकणी  स्थल है।

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