रविवार, जून 27, 2021

यज्ञोपवीत : मानवीय जीवन का संस्कार...


           

सनातन धर्म संस्कृति में यगोपवीत मानवीय जीवन की सभ्यता का प्रतीक है । यज्ञ और सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी द्वारा यगोपवीत की उतपति और संस्कार सभ्यता का रूप दिया गया है ।स्कन्द पुराण ,   ब्रह्मोपनिषद के अनुसार मानव जीवन को पाँच संस्कारों से युक्त होना आवश्यक है। यज्ञोपवीत संस्कार ,  यगोपवित , उपनयन, जनेऊ  संस्कार के बाद  विद्यारंभ होता है। उपनयन संस्कार में मुंडन और पवित्र जल से स्नान , पवित्र कुश से बना मुंज और धागा से बना हुआ जनेऊ  यज्ञोपवीतधारी व्यक्ति बाएँ कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। यज्ञोपवीत एक विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्थित सात ग्रन्थियां लगायी जाती हैं। ब्राह्मणों के यज्ञोपवीत में ब्रह्मग्रंथि होती है। तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है।  मूँज और धागे का बना जनेऊ तीन सूत्र  त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं। जनेऊ को उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध, मोनीबन्ध और ब्रह्मसूत्र कहा गया है । इंसान के  24 संस्कारों में  ‘उपनयन संस्कार’ के अंतर्गत ब्रह्मचर्य की शिक्षा , समन्वय , सौहार्द की शिक्षा प्राप्ति के बाद  जनेऊ पहनी जाती है ।उपनयन का शाब्दिक अर्थ  "सन्निकट ले जाना , ब्रह्म और ज्ञान के पास ले जाना" है ।
यज्ञोपवीत के छह धागों में से तीन धागे स्वयं के और तीन धागे पत्नी के लिए हैं। जनेऊ में तीन-सूत्र: त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा  देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण , सत्व, रज और तम ,  गायत्री मंत्र के तीन चरणों , तीन आश्रमों के प्रतीक  है। जनेऊ के धागों में एक मुख, दो नासिका, दो आंख, दो कान, मल और मूत्र के दो द्वारा मिलाकर नौ में   मुख से अच्छा बोले और खाएं, आंखों से अच्छा देंखे और कानों से अच्छा सुने। जनेऊ में पांच गांठ  को ब्रह्म, धर्म, अर्ध, काम और मोक्ष , यज्ञों, पांच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों के  प्रतीक है। जनेऊ की लंबाई 96 अंगुल होने से   जनेऊ धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने की शिक्षा मिलता है । 32 विद्याएं चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक ,  64 कलाओं में वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान  आती हैयज्ञोपवीत का उल्लेख , ब्राह्मण, उपनिषदादि , स्रौत , गृह ,और धर्मसूत्रों तथा प्राचीन साहित्य  में यज्ञोपवीत को  आठवां संस्कार है,। देवल स्मृति के  अनुसार याम में अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी ना करना), असंगता, लज्जा, असंचय, आस्तिकता, ब्रह्मचर्य, मौन, स्थिरता, क्षमा, और अभय  तथा नियम में  शौच , जप, तप, हवन, श्रद्धा, अतिथि सेवा,  तीर्थ यात्रा, परोपकार की चेष्टा , संतोष, और गुरुसेवा करना सकाम और निष्काम साधको के लिए उपयोगी है। यज्ञोपवीत धारण करने पर याम और नियम मिलते है। गीता १0/३५ में “ऋतुनाम कुसुमाकर:” , ब्राह्मण ग्रंथो तथा निरुक्त के अध्याय ७ में ब्राह्मण को  “बसंतो ब्राह्मणस्यर्तु: तथा वसन्तो ब्राह्मण: प्रोक्तो ब्रह्मयोनि: स उच्यते:”  वसंत ऋतू में   ब्राह्मण बालक के लिए यगोपवीत लाभदायक होता है ।क्षत्रिय बालक को “क्षत्रं ग्रीष्म: ग्रीष्मो वै राजन्यस्यर्तु:” ग्रीष्म ऋतू  में  क्षत्रिय बालक को यगोपवीत धारण करना चाहिए । शरद ऋतू में वैश्य बालक को  “पश्येम शरद: शतम” में  यगोपवीत धारण करना चाहिये । जनेऊ यज्ञोपवीत की वैज्ञानिकता और महत्त्व | जनेऊ / यज्ञोपवीत तीन धागों से बना हुआ एक ऐसा सूत्र है हर क्षण अनुशासित रहने कि शिक्षा देता है। संस्कृत भाषा में जनेऊ को  ‘यज्ञोपवीत’ कहा जाता है। जनेऊ संस्कार को “उपनयन संस्कार” भी कहते हैं। जनेऊ को  यज्ञसूत्र, मोनीबन्ध, व्रतबन्ध, बलबन्ध और ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। प्राचीन काल में जनेऊ पहनने के बाद ही बालक को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार  था। ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, प्रजापतेयर्त्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं, यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥
प्रजापति ने स्वाभाविक रूप से जनेऊ निर्माण किया है। जनेऊ का धागा कच्चे सूत से बना हुआ होता है। जनेऊ को व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर इस प्रकार पहना जाता है कि दाईं कमर के नीचे तक पहुच जाये। यह आयु, विद्या, यश और बल को बढ़ानेवाला है।  शास्त्रों के अनुसार  धर्म में 16 संस्कारों में   गर्भाधान , पुंसवन ,  सीमन्तोन्नयन,  जातकर्म,  नामकरण,  निष्क्रमण ,   अन्नप्राशन,  चूड़ाकर्म , विद्यारम्भ,  कर्णवेध ,   यज्ञोपवीत ,  वेदारम्भ,  केशान्त , समावर्तन , विवाह और  अन्त्येष्टि है । जनेऊ के  सूत्रों में देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण ,  सत्व, रजस् और तमस् ,  शरीर में उपस्थित प्राण शक्ति इडा, पिंगला तथा सुषुम्ना नाड़ी ,  गायत्री मंत्र विद्यमान चरण ,  आश्रमों ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ ,    भूतकाल, वर्तमानकाल तथा भविष्यतकाल , काल रक्षक , त्रिदोष कफ, पित्त तथा वात्त को भी नियंत्रित करता है। जनेऊ ९ सूत्र में मुख,  नसिका  , आंख  , कान , मूत्र द्वार , मल द्वार ,  मुख से सत्य और प्रिय वचन बोले और खाएं, नेत्रो से सूंदर देंखे और कानों से सुवचन सुनन चाहिये । जनेऊ की लम्बाई 96 अंगुल होती है । 64 कलाओं में जैसे- साहित्य कला, कृषि ज्ञान, वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी,  दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण है । यज्ञोपवीत में पांच गाँठ में   धर्म, अर्ध, काम, मोक्ष और ब्रह्म का प्रतीक है।  पांच यज्ञों, ऋषि यज्ञ, देव यज्ञ, बलि वैष्वानर यज्ञ, अतिथि यज्ञ व पितृ यज्ञ नामक पांच यज्ञों का नित्य विधान  है।  पञ्च ज्ञानेद्रियों में आंख कान नाक त्वचा जिह्वा पंच कर्मों का  प्रतीक है। शास्त्रों  में  जनेऊ धारण करने का उम्र बालक के जन्म से ब्राह्मण 8 वें वर्ष , क्षत्रिय 11 वे, तथा वैश्य 12 वे वर्ष में यज्ञोपवीत धारण  करने की परंपरा का उल्लेख है । विशेष परिस्थिति  में यज्ञोपवीत संस्कार नहीं हो सकने के कारण  ब्राह्मण 16 वें वर्ष में, क्षत्रिय 22 वे, तथा वैश्य 24 वे वर्ष में यज्ञोपवीत संस्कार का प्रावधान है। ब्राम्हण का वसंत ऋतु में, क्षत्रिय का ग्रीष्म में और वैश्य का उपवीत शरद ऋतु में होने का नियम है । जनेऊ का धारण शुभ दिन में जनेऊ संस्कार करने के समय बालक के हाथ में एकपलाश का  दंड में चावल , हल्दी , दुव , मुद्रा युक्त पोटली , बीना सिले हुए  पिले वस्त्र पहने , गले में पीले रंग का दुपट्टा धारण करता  है। मुंडन करके शिखा और  पैर में खड़ाऊ होती है।शास्त्र केअनुसार ज्येष्ठ पुत्र का  यज्ञोपवीत ज्येष्ठ मास में नहीं करने ,   पुनर्वसु नक्षत्र में ब्राह्मण का उपनयन नहीं करना चाहिए।  वैज्ञानिक दृष्टि में जनेऊ - वैज्ञानिक दृष्टि से भी जनेऊ पहनना स्वास्थ्य के दृष्टि से लाभदायक  और  हृदय रोग से बचाता है।हमारे कान में एक नस होता है जीका  जिसका सीधा सम्बन्ध मस्तिष्क से होता है जब जनेऊ  के माध्यम  से यह नस दबता है मस्तिष्क की कोई सोई हुई तंद्रा कार्य करने पर स्मरण शक्ति एवम विवेकशक्ति बढ़ाने में कार्य करती है। दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है।मल-मूत्र करने से पहले जनेऊ को   कानों पर कस कर दो बार लपेटने से  कान के पीछे की नसें, जिनका संबंध पेट की आंतों से होता है,नस के दबने से आंतों पर भी दबाव पड़ने के कारण मल विसर्जन आसानी से हो जाता है।कान के पास मल-मूत्र विसर्जन के समय सक्रिय होता है उससे कुछ द्रव्य निकलता है। जनेऊ उस द्रव्य को रोक देता है, जिससे पेट के रोग,  कब्ज, एसीडीटी,  मूत्रन्द्रीय रोग,  हृदय के रोग, रक्तचाप अन्य संक्रामक रोग होने से रोकते है।बुरे स्वप्नों से मुक्ति दिलाती है। कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी जाग्रत हो जाता है जिससे मनुष्य में दिव्यता बनी रहती है। जनेऊ पाचन संस्थान को ठीक करता है और पेट तथा शरीर के निचले अंगों में विकार नहीं लाने देता है। जनेऊ ‘एक्यूप्रेशर’ के विकल्प के रूप में  कार्य कर लक पक्षाघात बीमारियों से मुक्त करता है। जनेऊ मानवीय जीवन में मानसिक , शारीरिक , बौद्धिक तथा चतुर्दिक विकास का द्योतक है ।



           


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